Tuesday, May 21, 2019

الإيدز: مضادات الفيروسات تمنع انتقال المرض من خلال الجنس حتى بين المثليين

كشفت دراسة طبية حديثة عن أدلة جديدة تشير إلى فعالية عقاقير مضادة لفيروس نقص المناعة البشرية (الإيدز)، في منع انتقال الفيروس عبر العلاقة الجنسية بين الرجال المثليين.
وأجريت الدراسة المنشورة في دورية لانست، على ما يقرب من 1000 زوج من الرجال المثليين، ولم ترصد أي انتقال لفيروس الإيدز بينهم على مدار ثمانية أعوام.
والفضل في هذه النتيجة يعود إلى العلاج الذي قلل نسبة الفيروس إلى مستويات منخفضة للغاية في جسم المرضى.
ويقول الخبراء إن "ما لا يمكن رصده في الدم لا يمكن انتقاله من شخص لآخر" وهو ما يجب أن يعرفه الجميع عن فيروس الإيدز.
وتعني هذه المقولة أن الأشخاص الذين يتناولون علاجات الإيدز ويحافظون على معدلات منخفضة للفيروس في دمائهم، لا يمكنهم التسبب في نقل العدوى إلى غيرهم، حتى من خلال الممارسة الجنسية.
وتابعت الدراسة الأوروبية حوالي 972 من الأزواج الذكور المثليين، وكان أحدهما مصابا بفيروس نقص المناعة البشرية ويتناول علاج مضادات الفيروسات القهقرية(ART) بينما كان الآخر سليما، واستمرت خلال الفترة من 2010 حتى 2017.
وطوال مدة الدراسة لم ينتقل الفيروس من الشخص المصاب إلى الشريك الآخر بسبب العلاقة الجنسية الشرجية.
ويقول الباحثون إنه يمكن الوقاية ومنع الإصابة بالإيدز في حوالي 472 حالة.
وأكد الشركاء الذين شملتهم الدراستهم أنهم يمارسون الجنس بصورة عادية وفي حالات كثيرة بدون حماية، بلغت أكثر من 76 ألف حالة على مدار سنوات.
وعلى الرغم من أن 15 رجلا أصيبوا بفيروس الإيدز خلال إجراء هذه الدراسة، إلا أن الاختبارات الجينية أظهرت أن جميع الإصابات والفيروسات المنقولة لم تأت من خلال شريكهم الرئيسي في العلاقة.
وقال الباحثون "النتائج التي توصلنا إليها تقدم أدلة قاطعة على أن خطر انتقال فيروس الإيدز عن طريق ممارسة الجنس الشرجي عندما تكون نسبته في الدم ضعيفة، يساوي صفر".
وقالت البروفيسور أليسون رودجر، معدة الدراسة وأستاذة الأمراض المعدية في جامعة كوليدج بلندن، من المعروف أن الجنس الشرجي يمثل أعلى درجة مخاطر لانتقال العدوى، ولكن الآن يجب أن يطمئن الرجال المثليين.
وأضافت: "هذه الرسالة القوية يمكن أن تساعد في إنهاء وباء الإيدز عن طريق منع انتقال الفيروس، والتعامل مع وصمته وكذلك التمييز الذي يستهدف الكثير من المصابين بالمرض".
ودعت أليسون جميع الأشخاص المصابين بفيروس الإيدز إلى إجراء الفحوص والحصول على العلاج الفعال.
أصيب مات ستوكس، 26 عاما، بفيروس الإيدز في عام 2016، وبدأ العلاج بالعقاقير بعد أربعة أسابيع. وأظهرت الاختبارات أن الفيروس لم يتم اكتشافه في جسمه خلال ثلاثة أشهر.
ويقول: "إنها راحة كبيرة وتعطيني الثقة بالنفس لأعلم أنني لا أستطيع نقل الفيروس".
وأضاف: "لقد حدث تغيير حقيقي في مجتمع المثليين وبين أصدقائي في السنوات الأخيرة، يمكن وضع علامة "غير قابل للكشف" فوق النوع، على سبيل المثال."
ويوضح أن الطريق مازال طويلا حتى يدرك الجميع ما يعنيه هذا. "بعض الناس لا يريدون تصديق ذلك. لديهم خوف غير منطقي من أنه قد لا يكون صحيحا."
ويقول إن المؤسسات الخيرية التي تقوم بحملات حول هذه القضية تعطي هذه الرسالة "دفعة كبيرة" وتغير وجهات النظر حول ممارسة الجنس.
أكدت ديبورا جولد، الرئيس التنفيذي للصندوق الوطني لمكافحة الإيدز، على ضرورة بذل المزيد من الجهد لإيصال الرسالة إلى العاملين في مجال الرعاية الصحية والجمهور.
وقالت: "يجب أن يكون هناك فهم أفضل للكيفية التي ينتقل بها فيروس الإيدز وكيفية منعه، وندرك أيضا أن العلاج يوقف انتقال الفيروس. نعتقد أن هذا أمر حيوي لمعالجة وصمة العار".
وأظهرت الأبحاث السابقة أنه لا يوجد خطر على الأزواج من جنسين مختلفين من انتقال الفيروس، بعد أن يتناول الزوج المصاب العلاج، مما يدفع برنامج الأمم المتحدة المشترك لمكافحة الإيدز إلى إطلاق حملته (ما يمكن اكتشافه لا يمكن أن ينتقل).
وقال الدكتور فورد هيكسون، من كلية لندن للصحة والطب الاستوائي، "أكدت الدراسة على أن كبح المرضى فيروس الإيدز بمضادات الفيروسات القهقرية، سيساعدهم على عدم نقل فيروسهم إلى أشخاص آخرين أثناء ممارسة الجنس، أيا كان نوع الجنس الذي يمارسونه ".
في الدراسة، كان الرجال المصابون يتناولون مضادات الفيروسات القهقرية طوال أربع سنوات في المتوسط قبل المشاركة في الدراسة، مما يجعل الفيروس غير قابل للاكتشاف، وهو ما يعني أنه أقل من 200 نسخة لكل ميللتر من الدم.
يصل معظم الناس إلى هذا المستوى بعد تناول علاج فيروس الإيدز يوميا لمدة ستة أشهر.

Monday, May 6, 2019

लोकसभा चुनाव 2019: पाँचवें चरण का मतदान

पाकिस्तान के एबटाबाद में अमरीकी सैन्य बलों के हाथों अल-क़ायदा के सरग़ना ओसामा बिन लादेन की मौत को अब आठ साल हो चुके हैं.
ओसामा बिन लादेन जिस चरमपंथी संगठन की रहनुमाई कर रहे थे, उसे दुनिया के सबसे ख़तरनाक़ जिहादी गुटों में गिना जाता था.
इस गुट के झंडे तले कई लड़ाके लड़ा करते थे और ये भी माना जाता था कि अल-क़ायदा के पास बड़े पैमाhttps://www.bzbasel.ch/basel/basel-stadt/scientology-hat-kaeufer-fuer-basler-hauptsitz-gefunden-115454119ने पर आर्थिक संसाधन हैं.
लेकिन ओसामा बिन लादेन की मौत और ख़ुद को 'इस्लामिक स्टेट' कहने वाले चरमपंथी संगठन के उभार के साथ ही अल-क़ायदा की ताक़त और रसूख़ में भारी कमी आई.
ऐसे में ये सवाल उठता है कि आज अल-क़ायदा की क्या हैसियत रह गई है और दुनिया की सुरक्षा को अब इससे किस हद तक ख़तरा है?
हाल के सालों में जब चरमपंथी संगठन 'इस्लामिक स्टेट' दुनिया भर के अख़बारों की सुर्खियां बन रहा था तो उसी दरमियां अल-क़ायदा ने दूसरी रणनीति अपनाई.
अल-क़ायदा ने बिना ज़्यादा शोर-शराबा किए संगठन को फिर से मज़बूत करने का काम शुरू किया और क्षेत्रीय गुटों के साथ रिश्ते बनाए.
'यूएस नेशनल इंटेलीजेंस' ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि अल-क़ायदा के बड़े नेता संगठन की तरफ़ से फ़रमान जारी करने की व्यवस्था को मज़बूत कर रहे हैं.
चेतावनी में ये भी कहा गया है कि "अल-क़ायदा पश्चिमी देशों और अमरीका के ख़िलाफ़ हमलों को बढ़ावा देना जारी रखे हुए है."
वैश्विक आंतकवाद के ख़तरे पर साल की शुरुआत में आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है, "अल-क़ायदा की महत्वाकांक्षाएं बढ़ती हुई मालूम पड़ रही हैं...."
"ज़रूरत के मुताबिक़ ख़ुद को ढालने की इसकी क़ाबिलियत बनी हुई है. कई इलाक़ों में ये सक्रिय है. दुनिया के फलक पर फिर से खड़ा होने की इसकी तमन्ना बरक़रार है."
इसी साल फ़रवरी में ब्रिटेन के ख़ुफ़िया प्रमुख एलेक्स यंग ने भी अल-क़ायदा के फिर से उभार को लेकर चेताया था.
ड्रोन हमलों की अमरीकी मुहिम, इसके नेताओं की हत्या और इस्लामिक स्टेट के सामने मौजूद चुनौतियां, ये वो वजहें थीं जिनकी वजह से अल-क़ायदा ने नई रणनीति अपनाई.
उसने बड़ी कामयाबी से अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में अपने यूनिट्स या साझीदार संगठनों का नेटवर्क स्थापित किया.
अल-क़ायदा के ये साझीदार संगठन स्थानीय चरमपंथी गुट हैं जिन्होंने अल-क़ायदा के नेतृत्व के प्रति वफ़ादारी की क़सम खाई है.
इस्लामिक स्टेट के उलट अल-क़ायदा ने बड़ी एहतियात से स्थानीय आबादी से ख़ुद को अलग रखा है.
उसकी रणनीति स्थानीय चरमपंथी गुटों के साथ गठबंधन बनाकर साथ काम करने की है.
साल 2013 में अल-क़ायदा ने अपने संगठन में 'सुधार' के इरादे से 'जिहाद के लिए एक गाइडलाइन' जारी की थी.
इस दस्तावेज़ में अल-क़ायदा ने अपने चरमपंथियों को संयम के साथ और सामाजिक बर्ताव अपनाने की नसीहत दी थी.
उन्हें ऐसा व्यवहार करने से परहेज़ करने के लिए कहा गया जिससे स्थानीय लोग विरोध करें या फिर विद्रोह को हवा मिले.
एलीज़ाबेथ केंडल ऑक्सफर्ड के पेमब्रोक कॉलेज में सीनियर फ़ेलो हैं.
वे कहती हैं, "अल-क़ायदा ने भ्रष्टाचार और समाज के एक तबक़े को हाशिये पर रखे जाने जैसी स्थानीय चिंताओं को तवज्जो देनी शुरू कर दी है और वे इसे जिहाद के ग्लोबल एजेंडे में जगह दे रहे हैं."
वो कहती हैं, "ऐसा करके वो स्थानीय लोगों के बीच 'मसीहा' की तरह काम कर रहे हैं. इस्लामिक स्टेट के निर्दयी लड़ाकों के उलट वे ख़ुद को 'जेंटलमेन जिहादी' के तौर पर पेश कर रहे हैं."
अपनी शाखाओं और साझीदार चरमपंथी संगठनों के नेटवर्क के बूते अल-क़ायदा धीरे-धीरे अपने हमले बढ़ा रहा है.
'द आर्म्ड कॉन्फ़्लिक्ट लोकेशन एंड इवेंट डेटा प्रोजेक्ट' (ACLED) के आंकड़ें बताते हैं कि साल 2018 में अल-क़ायदा ने दुनिया भर में 316 हमलों को अंजाम दिया.
अल-क़ायदा की शाखाएं
अल-क़ायदा इन द इस्लामिक मग़रिब (AQIM): ये संगठन साल 2006 में उस वक़्त अस्तित्व में आया जब एक अल्जीरियाई चरमपंथी संगठन ने अल-क़ायदा से हाथ मिला लिया.
अरब प्रायद्वीप में अल-क़ायदा (AQAP): साल 2009 में एक अंतरराष्ट्रीय जिहादी नेटवर्क के यमन और सऊदी अरब में सक्रिय शाखाओं के विलय के बाद ये संगठन वजूद में आया.
भारतीय उपमहाद्वीप में अल-क़ायदा (AQIS)अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, बर्मा और बांग्लादेश में सक्रिय है. इसकी शुरुआत सितंबर, 2014 में हुई थी.
जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन अल-क़ायदा से जुड़ा एक संगठन है. माली और पश्चिमी अफ्रीका में कई चरमपंथी संगठनों के विलय के बाद ये अस्तित्व में आया था.
अल-शबाब सोमालिया और पूर्वी अफ्रीका में सक्रिय है. अल-क़ायदा से इसके रिश्ते की शुरुआत साल 2012 में हुई थी.
हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) सीरिया के कई चरमपंथी जिहादी गुटों के विलय के बाद वजूद में आया. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ इसके तार अल-क़ायदा से जुड़े हुए हैं. हयात तहरीर अल-शाम के पास फ़िलहाल उत्तरी सीरिया के इदलिब सूबे का कंट्रोल है.
मिस्र में अल-क़ायदाः मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप में अल-क़ायदा से जुड़े कई जिहादी गुट इसमें शामिल हैं.
साल 2015 में अल-क़ायदा के मौजूदा नेता अयमान अल-ज़वाहिरी ने अपने भाषण में बिन लादेन के 'टेरर नेटवर्क की मांद से निकले एक शेर' से दुनिया का परिचय कराया.
इस नौजवान शख़्स का नाम हमज़ा बिन लादेन था. ओसामा बिन लादेन के इस बेटे को आने वाले दिनों में अल-क़ायदा के नेता के तौर पर देखा जाता है.
अमरीका ने पहले ही हमज़ा बिन लादेन के बारे में सूचना देने वाले को 10 लाख डॉलर (सात करोड़ रुपये से ज़्यादा) देने की आधिकारिक रूप से घोषणा कर रखी है.
अल-क़ायदा से जुड़ी वेबसाइटों पर 30 साल के इस शख़्स को अल-क़ायदा के उभरते हुए सितारे के तौर पर पेश किया जाता है.
उन्हें लगता है कि हमज़ा जिहादियों की अगली पीढ़ी को प्रेरित कर सकता है और अल-क़ायदा में नई जान फूंक सकता है.
हाल के सालों में हमज़ा ने कई ऐसे ऑडियो और वीडियो संदेश जारी किए हैं जिनमें उसने अपने समर्थकों से अमरीका और उसके सहयोगी पश्चिमी देशों पर हमला करने और ओसामा बिन लादेन की मौत का इंतक़ाम लेने की अपील की है.
चैथम हाउस में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका विभाग की प्रमुख लिना ख़ातिब की राय में "इस्लामिक स्टेट के साम्राज्य के पतन के बाद अल-क़ायदा नेटवर्क को अपने ऑपरेशंस के बारे में ज़्यादा समझदारी और रणनीति के साथ सोचने के लिए मजबूर किया है."
"अल-क़ायदा को फिलहाल एक ऐसे लीडर की ज़रूरत है जो रणनीति बनाने में माहिर हो. यही वजह है कि हमज़ा बिन लादेन अल-क़ायदा में अपने पिता की जगह लेने के लिए समर्थन जुटाने की दिशा में आगे बढ़ता हुआ दिख रहा है."

Thursday, April 25, 2019

لماذا باتت دور العبادة هدفا متكررا للإرهاب؟

طرحت التفجيرات التي شهدتها مدينة كولومبو، عاصمة سريلانكا ومحيطها، والتي استهدفت ثلاث كنائس وعدة فنادق، من جديد تنامي خطر استهداف دور العبادة في الهجمات الإرهابية، ولماذا بات هذا الخطر متزايدا خلال الفترة الأخيرة؟
وأدت التفجيرات التي استهدفت الكنائس بصورة أساسية، في كولومبو وضواحيها، إلى مقتل ما يزيد على مئتي شخص، وفي الوقت الذي لم تعلن فيه أية جهة مسؤوليتها عن الهجمات، فرضت السلطات السريلانكية حظرا للتجول بصورة عاجلة، يستمر حتى الساعة السادسة صباحا بالتوقيت المحلي في كافة أنحاء سريلانكا.
وقد حظيت تفجيرات سيرلانكا الدامية، بإدانات من قبل العديد من الهيئات والجهات الإسلامية، في المنطقة العربية والعالم الإسلامي بشكل عام، إضافة إلى الإدانة الدولية، وقال الدكتور أحمد الطيب، شيخ الأزهر، في تغريدة له على الحساب الرسمي للأزهر الشريف، على موقعي تويتر وفيسبوك: "لا أتصور آدميا قد يستهدف الآمنين يوم عيدهم، هؤلاء الإرهابيون تناقضت فطرتهم مع تعاليم كل الأديان"، كما دعا لذوي الضحايا بالصبر وللمصابين بالشفاء العاجل.
ويعيد استهداف الكنائس في تفجيرات سريلانكا للأذهان ،سلسلة من الهجمات الإرهابية، التي تعرضت لها عدة دور للعبادة في عدة دول، ففي بلدة (كرايستشيرش) في نيوزيلندا، وخلال صلاة الجمعة يوم الخامس عشر من آذار/ مارس الماضي، أقدم مسلح من اليمين المتطرف، على قتل خمسين مسلما، بينما كانوا يؤدون الصلاة في مسجدين بالمدينة، في هجوم مروع قام ببثه مباشرة عبر وسائل التواصل الاجتماعي وهز العالم.
وفي مصر شهدت عدة دور للعبادة هجمات من هذا القبيل، ففي أواخر تشرين الثاني/ نوفمبر، من عام 2017 شن إرهابيون هجوما كان الأكثر دموية على أحد المساجد في سيناء أوقع ما يقارب الثلاثمئة قتيل.
ومن بين الهجمات المتعددة التي تعرضت لها الكنائس في مصر، يبرز تفجير كنيسة القديسين في منطقة سيدي بشر، بمدينة الإسكندرية، والذي وقع عشية احتفالات رأس السنة عام 2011، وأسفر عن مقتل 23 شخصا وإصابة 97 آخرين.
وكانت كنيسة البطرسية، في منطقة العباسية بالقاهرة أيضا، قد تعرضت لتفجير في الأول من كانون الأول/ ديسمبر عام 2016، أسفر عن مقتل 29 شخصا.
وتأتي تفجيرات الكنائس في سيرلانكا، لتمثل حلقة في سلسلة الهجمات، التي تستهدف دور العبادة، في أنحاء متفرقة من العالم، وتؤشر إلى أن تلك الدور، أصبحت هدفا سهلا للإرهابيين، وفي الوقت الذي يرى فيه مراقبون أنه قد يكون من الصعب، تحديد الجماعة التي استهدفت الكنائس في سريلانكا لتعدد هذه الجماعات، فإنهم يعتبرون أن استهداف دور العبادة، ربما يأتي من قبل جماعات تسعى لتحقيق هدف سياسي، وقد لا تكن عداء لدين بعينه.
لماذا باتت دور العبادة هدفا متكررا للهجمات الإرهابية؟
هل تعكس تلك الهجمات تداخلا بين الدين والسياسة في العديد من دول العالم؟
وهل تعتقدون أن وقوع هجمات جديدة من هذا النوع يغذي من تيار التطرف في كل عقيدة؟
وما هو السبيل برأيكم لإخراج دور العبادة من حسابات الجماعات السياسية؟
سنناقش معكم هذه المحاور وغيرها في حلقة الإثنين 22 نيسان/إبريل من برنامج نقطة حوار الساعة 16:06 جرينتش.
عمليات الإعدام في المملكة العربية السعودية ليست بالأمر الجديد. لكن يوم الثلاثاء، نفذت السلطات أحكام إعدام 37 مواطن سعودي بعد إدانتهم "بالإرهاب"، وأثار الخبر ضجة عالمية عبر مواقع التواصل.
إذ يمثل ذلك أكبر عملية إعدام في السعودية على مدار السنوات الثلاث الماضية، ورفع إجمالي عدد الإعدامات في المملكة إلى أكثر من 100 منذ بداية السنة.
وأثار الخبر نقاشا ساخنا بين المغردين حول الأدوار المتضاربة التي تلعبها المملكة العربية السعودية عالميا - فهل هي "رمز الإسلام" في العالم العربي أم قوة سياسية "قاسية" و "غير إنسانية"؟
وأعرب المستخدمون عن ما وصفوه بـ"التناقض" بين الصفات الأخلاقية التي تدعي المملكة أنها تمثلها، وبين الانطباع "غير الإنساني" الذي تخلفه عمليات الإعدام.
وقالت وكالة الأنباء السعودية إن واحدا من الذين نفذ فيهم حكم الإعدام صلب لاحقا - وهو قرار استوقف بعض المغردين.
فتساءل المغرد ماهر مهران عبر فيسبوك: "ألا يعد هذا 'تمثيلا ' بجثته .... وهو ما ينهي عنه الإسلام؟".
ومن جهة أخرى، رأى آخرون في ذلك "تطبيقا حقيقيا للشريعة الإسلامية" ومواجهة صارمة في وجه ما تصفه المملكة بالإرهاب.
واستخدم المغردون في السعودية هاشتاغ #تنفيذ_القصاص_علي_37_ارهابي للتعبير عن دعمهم للقرار السعودي ليتصدر الهاشتاغ لائحة تويتر السعودية ليلة أمس.
ودافع المغرد بندر عطيف عن القرار فكتب: "الإعدام جاء بحكم قضائي نزيه نتيجة ثبوت تورطهم بجرائم اشتملت على قتل الأبرياء والتخابر مع دول معادية ومهاجمة".
وقالت منظمة هيومان رايتس ووتش إن 33 من الذين أعدموا أمس من الأقلية الشيعية في المملكة السعودية - وهو أمر أثار نقاشا ساخنا بين المغردين.
فرأى البعض في ذلك "استهدافا" للأقلية الشيعية في المملكة، خاصة في وقت تتصاعد فيه التوترات بين السعودية وإيران في المنطقة.
وتداول المغردون عبر هاشتاغات #شهداء_القطيف و #شهداء_الحق صورا وتغريدات عن المعدومين، التي تصدرت تويتر في البحرين ولبنان، معبرين عن ألمهم وحزنهم لما وصفوها بـ"المجزرة".
والتفتت الأنظار إلى قصة مجتبى شويكات - أحد الأشخاص الذين أُعدموا - والذي اعتقل في ديسمبر كانون الثاني 2012 بينما كان يستعد لمغادرة البلاد في زيارة جامعية لجامعة ميشيغان الغربية بعمر الـ17.

Friday, April 12, 2019

नीतीश नो फैक्टर और कन्हैया से मेरी कोई तुलना नहींः तेजस्वी

बिहार में राजद, कांग्रेस, रालोसपा, हम और वीआईपी का महागठबंधन लोकसभा के 40 सीटों पर भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को सीधी टक्कर दे रहा है. दोनों तरफ़ के उम्मीदवारों की भी घोषणा हो चुकी है.
लेकिन गठबंधन राजनीति के दबाव और व्यक्तित्वों के टकराव की वजह से कई क्षेत्र में मुक़ाबला सीधा नहीं है.
सीपीआई-सीपीएम जैसे बड़े वाम दलों का महागठबंधन से बाहर रह जाना विपक्ष के लिए कुछ सीटों पर भारी पड़ सकता है. बेगूसराय में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, राजद के तनवीर हसन और सीपीआई के कन्हैया कुमार की उम्मीदवारी से न केवल संघर्ष त्रिकोणीय हुआ है बल्कि यह देश की हॉट सीट्स में शुमार हो गया है.
ताज़ा परिदृश्य में राजद के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने बीबीसी से लंबी बातचीत की और अपने गठबंधन की जीत के लिए पूरी तरह आश्वस्त दिखे.
उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कोई फैक्टर मानने से इंकार किया. तेजस्वी को कन्हैया कुमार से अपनी तुलना भी पसंद नहीं है. प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश-
चर्चा है कि बेगूसराय से कन्हैया के जीतने से राजद नेतृत्व विशेषकर तेजस्वी की चमक राष्ट्रीय फलक पर मंद पड़ जाएगी. आपको क्या लगता है?
अभी कन्हैया कौन से पद पर हैं. वो जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं और तबसे वो इतने वोकल हो गए हैं. मतलब सांसद नहीं बनेंगे तो वो समाप्त हो जाएंगे क्या. ये बात समझने की ज़रूरत है. कुछ चर्चा हो इसलिए ऐसी बात विरोधी फैलाते हैं. आज तक बाल ठाकरे चुनाव लड़े थे क्या, मुख्यमंत्री रहे थे क्या, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में उनका गहरा प्रभाव था. ऐसे कई नेता हुए हैं जो परदे के पीछे रहे और उनका ग़ज़ब का फॉलोविंग भी रहा है. पद मिल जाने से कोई नेता नहीं हो जाता. मुझे नहीं पता कि मेरी उनसे तुलना क्यों कर रहे हैं. किस बात की तुलना जबकि उनसे मेरी कोई समानता नहीं है. हमारे और उनके काम करने में बहुत अंतर है.
बेगूसराय से सीपीआई से कन्हैया कुमार उम्मीदवार हैं. बीते
कन्हैया के नामांकन और जनसभा में जो भीड़ जुटी थी उससे तो यही लगता है कि कन्हैया भी कमज़ोर स्थिति में नहीं हैं?
हमारा मक़सद भाजपा को हराना है और हमलोग हराएंगे. हम सक्षम हैं. तनवीर हसन साहब वहां से चुनाव जीतने जा रहे हैं. हम सभा कर के आये थे. लोग एक पाँव पर खड़े हैं पार्टी को जिताने और लालू जी को न्याय दिलाने के लिए. जब सामाजिक न्याय, संविधान और भाईचारे पर ख़तरा होगा तो उस स्थिति में वहां की जनता जानती है कि सामाजिक न्याय की असली लड़ाई राजद ही लड़ती है.
चुनाव में महागठबंधन की लड़ाई नीतीश कुमार से है या नरेंद्र मोदी से?
आज नीतीश जी कोई फ़ैक्टर नहीं हैं. वे जहाँ हैं वहां की नाव भी डुबो देंगे. हमलोगों को इस बार भाजपा को जवाब देना है. एक भी वादा पूरा नहीं किया गया. इनको जनता अच्छी तरह से जवाब देगी.
अगर विपक्ष चुनाव में जीतता है तो पीएम कौन होग?
हमलोग तो कहीं रेस में हैं नहीं और न ही पलटू चाचा हैं. एक बात स्पष्ट है कि यह चुनाव किसी एक व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने का चुनाव नहीं है. देश को बचाने का चुनाव है. राहुल गांधी हमें बतौर पीएम स्वीकार्य हैं.
दिनों ऐसा लग रहा था कि राजद उन्हें समर्थन कर सकता है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. क्यों?
कन्हैया के नाम की घोषणा महागठबंधन में सब कुछ तय हो जाने के बाद हुई थी. बेगूसराय सीट राजद की परंपरागत सीट रही है. यह सीट समाजवादियों का गढ़ रहा है. पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद तनवीर साहब को क़रीब पौने चार लाख वोट मिले थे. बहुत कम अंतर से वो चुनाव हारे थे. इसके अलावा बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के प्रमंडल स्तर के कार्यकर्ताओं का दबाव था कि तनवीर हसन साहब को ही पार्टी उम्मीदवार बनाए. वो पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष भी हैं. उनमें कोई कमी हमें नज़र नहीं आती.

Thursday, April 4, 2019

बीमारी में भी लोग काम पर क्यों आते हैं?

वीके सिंह 2012 के लोकपाल आंदोलन में अन्ना हज़ारे के साथ थे. आखिर लोकपाल नियुक्त करने में इतने साल क्यों लग गए, इस पर वीके सिंह ने विपक्ष का नेता न होने को कारण बताया.
उन्होंने कहा कि जब किसी को बुलाया गया तो उसने नेता विपक्ष होने का दर्जा दिए जाने की मांग की, जिससे समस्या पैदा हुई. सरकार को कोई समस्या नहीं है.
कहीं इसलिए तो देरी नहीं हुई कि ये वैधानिक संस्था सरकार से जवाबदेही की मांग करती है? ये पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इस सरकार में पिछली सरकारों की तरह भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं हैं.
वीके सिंह 2014 में बीजेपी के टिकट से यूपी के ग़ाज़ियाबाद से लोकसभा चुनाव जीते थे. इस बार भी वो यहीं से बीजेपी के उम्मीदवार हैं.
लेकिन ग़ाज़ियाबाद को दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार किया जाता है.
इस पर वीके सिंह का कहना था कि ग़ाज़ियाबाद में धूल और ढीले-ढाले नियम कायदों की वजह से वायु प्रदूषण है. इसके स्तर को कम करने की योजना हमने बनाई है.
कुछ विदेशी राजयनिकों ने विदेश मंत्रालय से वायु प्रदूषण पर चिंता है, क्या इससे देश की छवि प्रभावित नहीं होती है, इस पर उन्होंने कहा, "अगर आप प्रदूषण पर लिखते रहेंगे, ख़बरों को सनसनी बनाएंगे, कोई भी बाहर से आने वाला नर्वस होगा. इससे समस्या पैदा होती है. जो राजनयिकों ने चिंता जताई थी, वो दिल्ली के बारे में था. प्रदूषण समस्या है और हमें इससे उबरने के बारे में सोचना होगा."
प्राग में अगले दिन उनके नये ओपेरा 'डॉन जिओवानी' का प्रीमियर था. मोज़ार्ट की यह महान कृति इतिहास में सबसे प्रशंसित संगीत कार्यों में से एक बनने वाली थी.
लेकिन समस्या यह थी कि मोज़ार्ट ने उस रात तक इसका मुखड़ा नहीं बनाया था.
संयोग से यह महान संगीतकार टालमटोल करने का भी उस्ताद था. वह उस दिन भी काम तो कर रहे थे लेकिन कुछ और.
मोज़ार्ट के साथियों ने उन्हें समझाया कि अब और देरी ठीक नहीं है. आधी रात को वह काम पूरा करने के लिए घर लौटे.
वह पूरी रात लगे रहे. उनको जगाए रखने के लिए उनकी पत्नी उनको मुक्के मारती रही.
अंत में उन्होंने काम पूरा कर लिया, लेकिन अगली शाम प्रदर्शन में देरी हुई क्योंकि मुखड़े की कॉपी बनाने या उसके रिहर्सल के लिए समय नहीं था.
यदि आप भी उसी तरह के व्यक्ति हैं जो पूरी रात जगकर दिलचस्प चीज़ों, जैसे मुर्गियों को चश्मा पहनाने वाले किसानों के बारे में रिसर्च करते हैं या मोज़ार्ट की तरह हैं जो डेडलाइन करीब आने पर भी दूसरी चीज़ों में लगे रहते हैं तो आपको मदद की ज़रूरत हो सकती है.
काम टालने वालों को अक्सर अपनी इस आदत पर गर्व होता है. इसके सम्मान में एक "राष्ट्रीय शिथिलता सप्ताह" भी मनाया जाता है.
वैसे तो यह कार्यक्रम मार्च की शुरुआत में होना चाहिए, लेकिन स्वाभाविक रूप से इसमें देरी होती है.
इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि काम टालना एक बुरा विचार है.
2013 के एक अध्ययन से पता चला था कि कम तनख़्वाह और छोटी अवधि के रोज़गार करने वाले इस आदत के ज़्यादा शिकार होते हैं. बेरोजगार और कम रोजगार वाले भी इसके पीड़ित हो सकते हैं.
टालमटोल करने वाले लोग तनाव से भरे हो सकते हैं. यह आदत उनको बीमार भी बना सकती है.
इस आदत के लिए एक मज़ाकिया परिभाषा गढ़ी गई है- बिना किसी कारण के अपनी ज़िंदगी को बर्बाद करने वाला काम.
टाल-मटोल करने वाले लोगों की ज़िंदगी को पटरी पर लाने का एक उल्टा तरीका है- काम और कार्यक्रमों की सूची बनाना.
टाइम-टेबल बनाने के सामान्य तरीकों की तरह ही इसमें हफ्ते भर की गतिविधियों की सूची बनाई जाती है.
लेकिन जो काम पूरे करने हैं, उनकी जगह सूची में उन गतिविधियों को शामिल किया जाता है जो आप करेंगे ही, जैसे दोस्त के साथ डिनर करना या रात में अच्छी नींद के लिए सुबह दौड़ लगाना वगैरह.
अंत में इसमें वे काम जोड़े जाते हैं जिसके लिए आप पहले से प्रतिबद्ध हैं, जैसे छुट्टियां और बैठकें.
इस तकनीक की खोज मनोवैज्ञानिक और लेखक नील फ़ियर ने की थी. 1988 में उनकी किताब प्रकाशित हुई थी- "
फ़ियर की यह तकनीक ब्लॉग्स, ऑनलाइन वीडियो और किताबों के जरिये लोकप्रिय हो गई. मुख्यधारा के मनोचिकित्सक भी इसका इस्तेमाल करते हैं.
बर्कले में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया में काम करने के दौरान फ़ियर को पहली बार टाल-मटोल करने के ख़तरों का अहसास हुआ था.
तब तक उन्होंने अपनी कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए कुछ तकनीक विकसित कर ली थी और सिर्फ़ एक साल में अपनी डॉक्टरेट थीसिस भी लिख ली थी.
दूसरे छात्रों को इसमें तय वक़्त से करीब 9 से 10 महीने ज़्यादा लगते थे. कुछ मामलों में तो यह कई दशकों तक खिंच जाता था. (रिकॉर्ड 77 साल का है.)
फ़ियर ने शोध प्रबंध लिखने में जूझने वाले छात्रों के लिए एक सहायता समूह शुरू किया. उन्होंने एक आश्चर्यजनक चीज़ नोटिस की.

Tuesday, April 2, 2019

कांग्रेस आज जारी करेगी घोषणापत्र: आज की पांच बड़ी ख़बरें

कांग्रेस पार्टी ने मंगलवार, दो अप्रैल को आगामी लोकसभा चुनाव के लिए अपना घोषणापत्र जारी करने का ऐलान किया है. 
सात चरणों में होने वाले आगामी लोकसभा चुनाव के पहले चरण के लिए वोटिंग में अब सिर्फ 9 दिन बचे हैं.
ऐसे में कांग्रेस पार्टी पहले चरण के मतदान से पहले ही अपने वादों के साथ जनता के बीच उतरने की कोशिश कर रह है.
बिहार पहुंचेंगे मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आम चुनाव का एलान होने के बाद पहली बार बिहार का दौरा करने वाले हैं. वे मंगलवार को जमुई और गया में चुनावी जनसभाओं को संबोधित करेंगे.
जमुई बीजेपी की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान की सीट है.
प्रधानमंत्री मोदी पिछले महीने भी बिहार गए थे जब तीन मार्च को उन्होंने पटना में एनडीए की एक रैली को संबोधित किया था.
आज ही से प्रदेश के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार भी अपना चुनावी अभियान शुरु कर रहे हैं.
नमोटीवी के ख़िलाफ़ कांग्रेस ने चुनान आयोग का दरवाज़ा खटखटाया है और कहा है कि चुनाव के वक्त भाजपा इसके ज़रिए प्रोपोगैंडा फैलाने की कोशिश कर रही है.
चुनाव आयोग को लिखे एक पत्र में कांग्रेस ने कहा है कि प्रधानमंत्री के पर्सनल टीवी चैनल 'कॉटेंट टीवी' को हाल में कुछ डीटीएच प्लेफॉर्म्स पर लांच किया गया है, जिसमें बीजेपी से जुड़े विज्ञापन और बीजेपी की चुनावी रेलियां दिखाई जा रही हैं. इसके ख़िलाफ़ तुरंत कदम उठाए जाने चाहिए.
साथ ही चुनाव आयोग को लिखे एक और पत्र में कांग्रेस ने कहा है कि "सरकारी टीवी चैनल दूरदर्शन का भी ग़लत इस्तेमाल चुनाव प्रधानमंत्री की उपलब्धियां गिनवाने के लिए किया जा रहा है. ये ऑल इंडिया रेडिया और दूरदर्शन के लिए जारी चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों का उल्लंघन है."
दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गंठबंधन को लेकर अभी भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है.
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि हम राहुल गांधी के बात कर चुके हैं अब किसी और से बात करने की कोई ज़रूरत नहीं है.
वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शीला दीक्षित ने गठबंधन की अटकलों पर लगम लगाते हुए कहा है कि लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सभी सातों सीटों पर कांग्रेस को जीतना है.
ब्रितानी सांसद एक बार फिर ब्रेक्ज़िट के मुद्दे पर किसी वैकल्पिक रणनीति तक पहुंचने में नाकाम रहे हैं.
सांसदों ने सोमवार को यूरोपीय संघ से अलग होने के चार प्रस्तावित विकल्पों पर मतदान किया जिनमें से कोई भी पारित नहीं हो सका. इनमें कस्टम्स यूनियन के लिए यूरोपीय संघ से वार्ता करना करने का प्रस्ताव सिर्फ़ तीन मतों से गिर गया.
ब्रितानी प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे आज आगे की रणनीति बनाने के लिए लंबी कैबिनेट बैठक करने जा रही हैं. वो ब्रेक्ज़िट को लेकर अपने समझौते को चौथी बार संसद में पेश कर सकती हैं.
इसके अलावा वो ब्रेक्ज़िट के लिए यूरोपीय संघ से अतिरिक्त समय की मांग भी कर सकती हैं. फिलहाल 12 अप्रैल तक का समय उनके पास है.
''अगर 38 साल के पीएचडी धारक शख़्स को नौकरी नहीं मिल रही है तो इस पर सवाल होना चाहिए कि देश और राज्य का भविष्य क्या होगा?''
बेरोज़गारी के प्रभाव को लेकर सवाल पूछने पर महाराष्ट्र के नांदेड़ के रहने वाले चंद्रकांत गजभरे ने तपाक से ये जवाब दिया. चंद्रकांत पीएचडी कर रहे हैं और उन्हें पैसे कमाने के लिए ऑटोरिक्शा चलाना पड़ता है.
चंद्रकांत 15 सालों से नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उनके पास समाज विज्ञान में एमए की डिग्री है. उन्होंने दो बार नेट-सेट की परीक्षा दी है और अब उनकी पीएचडी भी पूरी होने वाली है.
फिर भी उनके पास एक निश्चति आय का ज़रिया नहीं है जिससे उनकी मूलभूत ज़रूरतें पूरी हो सकें.
चंद्रकांत ने नौकरी के लिए हर तरह की कोशिश की. उन्होंने होटल में वेटर तक का काम किया. दूसरे शहरों में भी नौकरी ढूंढने की कोशिश की लेकिन किराये पर रहने के कारण उनके लिए पैसे बचाना मुश्किल हो गया था. इसलिए वो वापस नांदेड़ चले आए.
सुबह के समय वो गेस्ट लेक्चर के तौर पर काम करते हैं लेकिन उससे भी पर्याप्त आय नहीं हो पाती.
उन्होंने दिन में ऑटो चलाने का कारण बताया. चंद्रकांत बताते हैं, ''मेरे जैसे लोगों के लिए शिक्षा ही जीने का एकमात्र रास्ता है. इसलिए मैंने उच्च शिक्षा हासिल की पर मुझे इससे जुड़ी नौकरी नहीं मिली. ऐसे में दूसरे शहर में जाकर किसी कंपनी या होटल में काम करने के बजाय मैंने इसी शहर में रहकर कमाने का फैसले किया.''
चंद्रकांत के लिए कोई भी काम छोटा नहीं है. वह मानते हैं कि किसी भी पेशे को नीची नज़रों से नहीं देख जाना चाहिए. हालांकि, वो अपनी पढ़ाई जारी रखेंगे और नौकरी की तलाश करते रहेंगे.
चंद्रकांत अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो उच्च शिक्षा पाने के बाद भी अजीविका के लिए संघर्ष कर रहें हैं. यहां के युवाओं से बात करने पर पता चलता है कि बेरोजगारी किस स्तर पर है और किस तरह की है.

Thursday, December 20, 2018

ما الصلة بين البحث عن كلمة "أحمق" في غوغل وصورة ترامب؟

ارتبط البحث عن كلمة "أحمق" في محرك البحث الشهير غوغل بصورة الرئيس الأمريكي، دونالد ترامب، إذ بحث المستخدمون عن الكلمة أكثر من مليون مرة.
وأثيرت هذه القضية في جلسة استماع لمدير شركة غوغل، ساندار بيتشاي، أمام الكونغرس.
وسأله أعضاء مجلس النواب الأمريكي إذا كان هذا الربط مثالا عن التحيز السياسي للموقع، فنفى مدير غوغل ذاك.
وقال إن كلمة "أحمق" هي الآن أكثر كلمات البحث رواجا في الولايات المتحدة.
وطرحت عضو مجلس الشيوع عن الحزب الجمهوري، زوي لوفغرين، سؤالا: "لماذا يعطي البحث عن كلمة "أحمق" صورا من بينها صورة الرئيس"؟ كيف يحدث هذا، وكيف تتم عملية البحث؟.
فأجاب بيتشاي أن البحث في غوغل يعتمد على المليارات من الكلمات المفتاحية تترتب على أساس عوامل كثيرة، من بينها العلاقة فيما بينها وتكرارها في النصوص المنشورة على الانترنت.
وقال في رده على لوفغرين إن الأمر "ليس رجلا يقف وراء الشاشة ويقرر بنفسه الإجابات التي تقدمها للباحثين على غوغل".
وتواصلت مساءلة بيتشاي في الكونغرس، إذ طرح ستيف تشابوت، سؤالا عن سبب ظهور الأخبار السلبية فقط عندما يبحث عن قانون الرعاية الصحية لحزبه، فرد عليه بيتشاي بأن الأخبار السلبية تظهر أيضا عندما يبحث الناس عن كلمة "غوغل".
وقد تبيت العلاقة بين كلمة "أحمق" والرئيس ترامب في غوغل مطلع هذا العام. ويعتقد البعض أن المحتجين البريطانيين رفعوا أغنية "الأحمق الأمريكي" في قائمة الأغاني الأكثر رواجا في البلاد، خلال زيارة ترامب لبريطانيا في يوليو/ تموز، وهو ما عزز الارتباط بين كلمة "أحمق" والرئيس الأمريكي على الانترنت.
ونشر مدونون على موقع ريديت سلسلة مقالات فيها صور ترامب وتتضمن كلمة "أحمق"، بهدف التلاعب بمحركات البحث والتأثير في نتائجها، وهي عملية معروفة، لدى المدونين والناشطين على الانترنت.
وهذه ليست المرة الأولى التي يرتبط اسم رئيس أمريكي بكلمة سيئة. ففي عام 2003 ارتبط اسم الرئيس جورج بوش، في محركات البحث، بعبارة "الفشل الذريع".
وبينت المساءلة أن بعض أعضاء الكونغرس معلوماتهم التكنولوجية ضئيلة.
فقد طرح نائب الكونغرس، ستيف كينغ، سؤالا يتعلق بهاتف أيفون جدته الذي أصبح يعمل بطريقة غريبة، فأجابه بيتشاي بأن هاتف آيفون لم تصنعه شركة غوغل.
عثرت الشرطة البريطانية على جثة عامل بناء أبلغ مستخدمون لغرفة دردشة "بال توك" عن واقعة انتحاره التي حدثت أمامهم على الإنترنت.
وعُثر على ليون جينكينز، 43 عاما، مشنوقا في شقته في كارديف في يونيو/حزيران الماضي، حسبما أشارت التحقيقات.
وخلصت التحقيقات إلى أنه كان مستخدما نشطا لمنتديات دردشة "بال توك" عندما انتحر.
وقالت راشيل نايت، مسؤول مساعد في تحقيقات الطب الجنائي، إنه لا يوجد أي دليل يشير إلى استفزاز جينكينز أثناء نشاطه على الإنترنت.
وأضافت أنه أثير من قبل مخاوف بشأن موقع "بال توك" ووصفه بأنه "موقع غير مفيد" بعد وفاة بريطانيين اثنين آخرين كانا يستخدمانه.
وكانت الشرطة قد داهمت منزله بعد اتصال تلقته من مدير منتديات "بال توك" التي تتيح فرصة تعارف ودردشة الأفراد من شتى أرجاء العالم.
وسمعت الشرطة أصوات أناس "بلهجات أجنبية" تصدر من جهاز كمبيوتر، يسألون إن كان ما يرونه حقيقيا.
ورد صوت قائلا :"يا إلهي، إنه حقيقي".
وعلمت محكمة تحقيقات الطب الجنائي أن الشرطة عثرت على كاميرا للبث المباشر وانقطع اتصالها، أثناء سعي الشرطة إلى إنقاذ حياته.
وأظهر سجل مكالمته الهاتفية أن جينكينز أجرى آخر مكالمة مع سيدة من تينيسي في الولايات المتحدة، صديقة له على الرغم من أنهما لم يلتقيا على الإطلاق.
وقالت نايت إن جينكينز :"عاش حياته في عالم الواقع، لكنه عاش جزءا منها على الإنترنت وكان يقضي وقتا كثيرا على الإنترنت".
وتحدث محققون مع عدد من الأفراد يستخدمون غرف الدردشة مع جينكينز من كندا والولايات المتحدة واستراليا.
وقال أحدهم للشرطة إن جينكينز كان شخصية "غريبة نوعا ما".
وعلمت التحقيقات أنه يمتلك سجلا من المعاناة من مشكلات الصحة العقلية تطلبت تدخلا طبيا في الماضي.
وقالت مساعدة التحقيقات في الطب الجنائي إن جينكينز أصبح منسحبا منذ مارس/آذار الماضي، ولم يرد على مكالمات الهاتف من أفراد أسرته.
وأضافت نايت، التي سجلت الواقعة بأنها انتحار، أنه من الواضح أن جينكينز كان لديه شبكة من الأصدقاء في شتى أرجاء العالم على الإنترنت.