Thursday, April 4, 2019

बीमारी में भी लोग काम पर क्यों आते हैं?

वीके सिंह 2012 के लोकपाल आंदोलन में अन्ना हज़ारे के साथ थे. आखिर लोकपाल नियुक्त करने में इतने साल क्यों लग गए, इस पर वीके सिंह ने विपक्ष का नेता न होने को कारण बताया.
उन्होंने कहा कि जब किसी को बुलाया गया तो उसने नेता विपक्ष होने का दर्जा दिए जाने की मांग की, जिससे समस्या पैदा हुई. सरकार को कोई समस्या नहीं है.
कहीं इसलिए तो देरी नहीं हुई कि ये वैधानिक संस्था सरकार से जवाबदेही की मांग करती है? ये पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इस सरकार में पिछली सरकारों की तरह भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं हैं.
वीके सिंह 2014 में बीजेपी के टिकट से यूपी के ग़ाज़ियाबाद से लोकसभा चुनाव जीते थे. इस बार भी वो यहीं से बीजेपी के उम्मीदवार हैं.
लेकिन ग़ाज़ियाबाद को दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार किया जाता है.
इस पर वीके सिंह का कहना था कि ग़ाज़ियाबाद में धूल और ढीले-ढाले नियम कायदों की वजह से वायु प्रदूषण है. इसके स्तर को कम करने की योजना हमने बनाई है.
कुछ विदेशी राजयनिकों ने विदेश मंत्रालय से वायु प्रदूषण पर चिंता है, क्या इससे देश की छवि प्रभावित नहीं होती है, इस पर उन्होंने कहा, "अगर आप प्रदूषण पर लिखते रहेंगे, ख़बरों को सनसनी बनाएंगे, कोई भी बाहर से आने वाला नर्वस होगा. इससे समस्या पैदा होती है. जो राजनयिकों ने चिंता जताई थी, वो दिल्ली के बारे में था. प्रदूषण समस्या है और हमें इससे उबरने के बारे में सोचना होगा."
प्राग में अगले दिन उनके नये ओपेरा 'डॉन जिओवानी' का प्रीमियर था. मोज़ार्ट की यह महान कृति इतिहास में सबसे प्रशंसित संगीत कार्यों में से एक बनने वाली थी.
लेकिन समस्या यह थी कि मोज़ार्ट ने उस रात तक इसका मुखड़ा नहीं बनाया था.
संयोग से यह महान संगीतकार टालमटोल करने का भी उस्ताद था. वह उस दिन भी काम तो कर रहे थे लेकिन कुछ और.
मोज़ार्ट के साथियों ने उन्हें समझाया कि अब और देरी ठीक नहीं है. आधी रात को वह काम पूरा करने के लिए घर लौटे.
वह पूरी रात लगे रहे. उनको जगाए रखने के लिए उनकी पत्नी उनको मुक्के मारती रही.
अंत में उन्होंने काम पूरा कर लिया, लेकिन अगली शाम प्रदर्शन में देरी हुई क्योंकि मुखड़े की कॉपी बनाने या उसके रिहर्सल के लिए समय नहीं था.
यदि आप भी उसी तरह के व्यक्ति हैं जो पूरी रात जगकर दिलचस्प चीज़ों, जैसे मुर्गियों को चश्मा पहनाने वाले किसानों के बारे में रिसर्च करते हैं या मोज़ार्ट की तरह हैं जो डेडलाइन करीब आने पर भी दूसरी चीज़ों में लगे रहते हैं तो आपको मदद की ज़रूरत हो सकती है.
काम टालने वालों को अक्सर अपनी इस आदत पर गर्व होता है. इसके सम्मान में एक "राष्ट्रीय शिथिलता सप्ताह" भी मनाया जाता है.
वैसे तो यह कार्यक्रम मार्च की शुरुआत में होना चाहिए, लेकिन स्वाभाविक रूप से इसमें देरी होती है.
इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि काम टालना एक बुरा विचार है.
2013 के एक अध्ययन से पता चला था कि कम तनख़्वाह और छोटी अवधि के रोज़गार करने वाले इस आदत के ज़्यादा शिकार होते हैं. बेरोजगार और कम रोजगार वाले भी इसके पीड़ित हो सकते हैं.
टालमटोल करने वाले लोग तनाव से भरे हो सकते हैं. यह आदत उनको बीमार भी बना सकती है.
इस आदत के लिए एक मज़ाकिया परिभाषा गढ़ी गई है- बिना किसी कारण के अपनी ज़िंदगी को बर्बाद करने वाला काम.
टाल-मटोल करने वाले लोगों की ज़िंदगी को पटरी पर लाने का एक उल्टा तरीका है- काम और कार्यक्रमों की सूची बनाना.
टाइम-टेबल बनाने के सामान्य तरीकों की तरह ही इसमें हफ्ते भर की गतिविधियों की सूची बनाई जाती है.
लेकिन जो काम पूरे करने हैं, उनकी जगह सूची में उन गतिविधियों को शामिल किया जाता है जो आप करेंगे ही, जैसे दोस्त के साथ डिनर करना या रात में अच्छी नींद के लिए सुबह दौड़ लगाना वगैरह.
अंत में इसमें वे काम जोड़े जाते हैं जिसके लिए आप पहले से प्रतिबद्ध हैं, जैसे छुट्टियां और बैठकें.
इस तकनीक की खोज मनोवैज्ञानिक और लेखक नील फ़ियर ने की थी. 1988 में उनकी किताब प्रकाशित हुई थी- "
फ़ियर की यह तकनीक ब्लॉग्स, ऑनलाइन वीडियो और किताबों के जरिये लोकप्रिय हो गई. मुख्यधारा के मनोचिकित्सक भी इसका इस्तेमाल करते हैं.
बर्कले में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया में काम करने के दौरान फ़ियर को पहली बार टाल-मटोल करने के ख़तरों का अहसास हुआ था.
तब तक उन्होंने अपनी कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए कुछ तकनीक विकसित कर ली थी और सिर्फ़ एक साल में अपनी डॉक्टरेट थीसिस भी लिख ली थी.
दूसरे छात्रों को इसमें तय वक़्त से करीब 9 से 10 महीने ज़्यादा लगते थे. कुछ मामलों में तो यह कई दशकों तक खिंच जाता था. (रिकॉर्ड 77 साल का है.)
फ़ियर ने शोध प्रबंध लिखने में जूझने वाले छात्रों के लिए एक सहायता समूह शुरू किया. उन्होंने एक आश्चर्यजनक चीज़ नोटिस की.

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