Thursday, December 20, 2018

ما الصلة بين البحث عن كلمة "أحمق" في غوغل وصورة ترامب؟

ارتبط البحث عن كلمة "أحمق" في محرك البحث الشهير غوغل بصورة الرئيس الأمريكي، دونالد ترامب، إذ بحث المستخدمون عن الكلمة أكثر من مليون مرة.
وأثيرت هذه القضية في جلسة استماع لمدير شركة غوغل، ساندار بيتشاي، أمام الكونغرس.
وسأله أعضاء مجلس النواب الأمريكي إذا كان هذا الربط مثالا عن التحيز السياسي للموقع، فنفى مدير غوغل ذاك.
وقال إن كلمة "أحمق" هي الآن أكثر كلمات البحث رواجا في الولايات المتحدة.
وطرحت عضو مجلس الشيوع عن الحزب الجمهوري، زوي لوفغرين، سؤالا: "لماذا يعطي البحث عن كلمة "أحمق" صورا من بينها صورة الرئيس"؟ كيف يحدث هذا، وكيف تتم عملية البحث؟.
فأجاب بيتشاي أن البحث في غوغل يعتمد على المليارات من الكلمات المفتاحية تترتب على أساس عوامل كثيرة، من بينها العلاقة فيما بينها وتكرارها في النصوص المنشورة على الانترنت.
وقال في رده على لوفغرين إن الأمر "ليس رجلا يقف وراء الشاشة ويقرر بنفسه الإجابات التي تقدمها للباحثين على غوغل".
وتواصلت مساءلة بيتشاي في الكونغرس، إذ طرح ستيف تشابوت، سؤالا عن سبب ظهور الأخبار السلبية فقط عندما يبحث عن قانون الرعاية الصحية لحزبه، فرد عليه بيتشاي بأن الأخبار السلبية تظهر أيضا عندما يبحث الناس عن كلمة "غوغل".
وقد تبيت العلاقة بين كلمة "أحمق" والرئيس ترامب في غوغل مطلع هذا العام. ويعتقد البعض أن المحتجين البريطانيين رفعوا أغنية "الأحمق الأمريكي" في قائمة الأغاني الأكثر رواجا في البلاد، خلال زيارة ترامب لبريطانيا في يوليو/ تموز، وهو ما عزز الارتباط بين كلمة "أحمق" والرئيس الأمريكي على الانترنت.
ونشر مدونون على موقع ريديت سلسلة مقالات فيها صور ترامب وتتضمن كلمة "أحمق"، بهدف التلاعب بمحركات البحث والتأثير في نتائجها، وهي عملية معروفة، لدى المدونين والناشطين على الانترنت.
وهذه ليست المرة الأولى التي يرتبط اسم رئيس أمريكي بكلمة سيئة. ففي عام 2003 ارتبط اسم الرئيس جورج بوش، في محركات البحث، بعبارة "الفشل الذريع".
وبينت المساءلة أن بعض أعضاء الكونغرس معلوماتهم التكنولوجية ضئيلة.
فقد طرح نائب الكونغرس، ستيف كينغ، سؤالا يتعلق بهاتف أيفون جدته الذي أصبح يعمل بطريقة غريبة، فأجابه بيتشاي بأن هاتف آيفون لم تصنعه شركة غوغل.
عثرت الشرطة البريطانية على جثة عامل بناء أبلغ مستخدمون لغرفة دردشة "بال توك" عن واقعة انتحاره التي حدثت أمامهم على الإنترنت.
وعُثر على ليون جينكينز، 43 عاما، مشنوقا في شقته في كارديف في يونيو/حزيران الماضي، حسبما أشارت التحقيقات.
وخلصت التحقيقات إلى أنه كان مستخدما نشطا لمنتديات دردشة "بال توك" عندما انتحر.
وقالت راشيل نايت، مسؤول مساعد في تحقيقات الطب الجنائي، إنه لا يوجد أي دليل يشير إلى استفزاز جينكينز أثناء نشاطه على الإنترنت.
وأضافت أنه أثير من قبل مخاوف بشأن موقع "بال توك" ووصفه بأنه "موقع غير مفيد" بعد وفاة بريطانيين اثنين آخرين كانا يستخدمانه.
وكانت الشرطة قد داهمت منزله بعد اتصال تلقته من مدير منتديات "بال توك" التي تتيح فرصة تعارف ودردشة الأفراد من شتى أرجاء العالم.
وسمعت الشرطة أصوات أناس "بلهجات أجنبية" تصدر من جهاز كمبيوتر، يسألون إن كان ما يرونه حقيقيا.
ورد صوت قائلا :"يا إلهي، إنه حقيقي".
وعلمت محكمة تحقيقات الطب الجنائي أن الشرطة عثرت على كاميرا للبث المباشر وانقطع اتصالها، أثناء سعي الشرطة إلى إنقاذ حياته.
وأظهر سجل مكالمته الهاتفية أن جينكينز أجرى آخر مكالمة مع سيدة من تينيسي في الولايات المتحدة، صديقة له على الرغم من أنهما لم يلتقيا على الإطلاق.
وقالت نايت إن جينكينز :"عاش حياته في عالم الواقع، لكنه عاش جزءا منها على الإنترنت وكان يقضي وقتا كثيرا على الإنترنت".
وتحدث محققون مع عدد من الأفراد يستخدمون غرف الدردشة مع جينكينز من كندا والولايات المتحدة واستراليا.
وقال أحدهم للشرطة إن جينكينز كان شخصية "غريبة نوعا ما".
وعلمت التحقيقات أنه يمتلك سجلا من المعاناة من مشكلات الصحة العقلية تطلبت تدخلا طبيا في الماضي.
وقالت مساعدة التحقيقات في الطب الجنائي إن جينكينز أصبح منسحبا منذ مارس/آذار الماضي، ولم يرد على مكالمات الهاتف من أفراد أسرته.
وأضافت نايت، التي سجلت الواقعة بأنها انتحار، أنه من الواضح أن جينكينز كان لديه شبكة من الأصدقاء في شتى أرجاء العالم على الإنترنت.

Thursday, December 13, 2018

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

शब्द और राष्ट्रपति ट्रंप की तस्वीरों का संबंध सबसे पहले इस साल सामने आया था. तब कुछ लोगों ने इसके तार इस साल जुलाई में ट्रंप के ब्रिटेन दौरे के समय हुए विरोध से जुड़े बताए.
तब ब्रिटिश प्रदर्शनकारियों ने नाम के एक गाने को ब्रिटेन में म्यूज़िक चार्ट में टॉप करवा दिया था.
इसके बाद रेडिट वेबसाट पर यूज़र्स ने ऐसे आर्टिकलों की बौछार कर दी जिनमें ट्रंप की बगल में इडियट शब्द लिखा था.
ये वेबसाइट के सर्च इंजिन डेटाबेस को प्रभावित करने की एक कोशिश थी, जिसे "गूगल बॉम्बिंग" कहा जाता है.
सुनवाई के दौरान ये भी पता चला कि कई सांसदों को तकनीकी दुनिया की बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं है.
वहाँ स्टीव किंग नाम के एक सांसद ने सुंदर पिचाई से पूछा कि उनकी पोती का आईफ़ोन अजीब तरह से क्यों चल रहा है.
इसके जवाब में सुंदर पिचाई ने उन्हें समझाया कि आईफ़ोन गूगल ने नहीं बनाया.
सड़कें आम तौर पर काले रंग की होती हैं मगर जर्मनी में एक सड़क का रंग ही बदल गया - वो भूरी हो गई.
और ये इसलिए हुआ क्योंकि उस सड़क पर चॉकलेट की चादर बिछ गई.
जर्मनी के वेस्टनेन शहर में हुआ ये कि एक फ़ैक्टरी में चॉकलेट से भरा एक टैंक लीक करने लगा और एक टन चॉकलेट बाहर निकल रास्ते पर बिखर गया.
ठंड काफ़ी थी और देखते-देखते ये चॉकलेट जम गई और रास्ते को बंद करना पड़ गया.
इमेज कॉपीरइट Reuters
फिर अग्निशमन दल को बुलाया गया और 25 दमकल कर्मचारियों ने गर्म पानी और फ़ावड़े आदि का इस्तेमाल कर चॉकलेट को रास्ते से साफ़ किया
इस काम में फ़ैक्ट्री के कर्मचारियों ने भी रास्ते की सफ़ाई में हाथ बँटाया.
अग्निशमन विभाग ने कहा काफ़ी चॉकलेट बह गया मगर इस बात की संभावना बहुत कम है कि क्रिसमस पर चॉकलेट की क़िल्लत होगी.मेज कॉपीरइट  
ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे को ब्रेक्सिट मुद्दे पर एक और बड़ी परीक्षा से गुज़रना पड़ रहा है.
उनकी कंज़र्वेटिव पार्टी के कई सांसदों ने ब्रेक्सिट मुद्दे पर टेरीज़ा मे के रवैए पर सवाल उठाया था, जिसके बाद पार्टी में अविश्वास प्रस्ताव पर बुधवार को मतदान कराया जाएगा.
सांसदों ने अगर नेतृत्व परिवर्तन का फ़ैसला किया तो टेरीज़ा मे को गद्दी छोड़नी पड़ सकती है.
मतदान स्थानीय समयानुसार शाम छह बजे से आठ बजे तक (भारतीय समयानुसार रात साढ़े 11 बजे से रात डेढ़ बजे तक होगा) और नतीजे एक घंटे बाद आ जाने की संभावना है.
टेरीज़ा मे को बुधवार को आयरलैंड की राजधानी डबलिन में वहाँ के प्रधानमंत्री लियो वराडकर से मिलना था, लेकिन उन्होंने विश्वास प्रस्ताव की वजह से अपना दौरा रद्द कर दिया.
उन्होंने कहा है कि वो अपने नेतृत्व को मिली इस चुनौती का यथाशक्ति सामना करेंगी.
उन्होंने कहा है कि अभी किसी तरह के नेतृत्व परिवर्तन से देश का भविष्य ख़तरे में पड़ सकता है.
टेरीज़ा मे के नेतृत्व को लेकर ये अविश्वास मत ऐसे समय आ रहा है, जब ब्रेक्सिट फ़ैसले को लागू होने में तीन महीने का वक़्त बचा है.
संवाददाताओं का कहना है कि टेरीज़ा मे अगर ये विश्वास मत जीत भी जाती हैं तो भी इस चुनौती से पार्टी में उनकी स्थिति काफ़ी कमज़ोर हो जाएगी.
टेरीज़ा मे अगर ये प्रस्ताव जीत जाती हैं, तो कम-से-कम अगले एक साल तक दोबारा उनके नेतृत्व को चुनौती नहीं दी जा सकेगी.
लेकिन अगर वो विश्वास मत हार जाती हैं तो पार्टी में नए नेता का चुनाव होगा जिसमें वो उम्मीदवार नहीं हो सकतीं.
टेरीज़ा मे 2016 में ब्रेक्सिट पर हुए जनमत संग्रह के कुछ ही समय बाद प्रधानमंत्री बनी थीं जिसमें ब्रिटेन के मतदाताओं ने यूरोपीय यूनियन से अलग होने के पक्ष में मतदान किया.

Monday, November 12, 2018

2015中英文化交流年 第二届全球中国对话:超文化与新型全球治理 |

球青年企业家协会 
为全球的青年企业家和未来的领导人分享知识、发掘机会和资源,从而促进全球商业合作的企业家协会。
 英国教育签证中
 是由英国百所国立大学、英国高等教育招生委员会、英国移民事务署,及英国移民律师公会授权运营的权威英国教育及签证移民服务机构。十多年来一直以“促进国际人才的流动,加强人才的多元化及竞争力,提升全球教育机会的平等和透明化”为使命而不断努力。
 海外大学智能申请平
 是全球领先的海外大学在线申请平台,整合了包括海外金融、海外房产和国际实习等一系列境外生活服务,使学生可以享受高度人性化和智能化的全方位留学服务。
( 英国教育签证中心综编,图片来自网络,转载请说明
2015年是中英文化交流年,在中英文化交流史上具有重要的意义。中英两国在对方国家举办一系列高水平的文化活动,并均以“创意/创造( )”作为各自文化季的主题,以进一步加强两国的文化交流和产业合作,增进两国人民的相互了解和友谊。
第二届全球中国对话于中英文化交流年期间举办意义重大。这次活动将以“超文化和新型全球治理” 为主题展开对话与交流, 诸多领域国际著名学者和对全球事务具有影响力的人物将参加对话。会上将创刊《中国比较研究》双语期刊,介绍超文化与新型全球治理,展开若干主题的对话与讨论,如超文化和比较视野下的“文明的对话”,中欧可持续城镇化研究,英国的学校治理、全球超文化教育与学习,及社会创造、超文化及其新型全球治理。来自中国、美国、法国、比利时和英国等诸多领域国际著名学者和对全球事务具有影响力的人物参加对话。
这次活动将由全球中国比较研究会、英国威斯敏斯特大学中国传媒中心、中国复旦大学发展学院全球青年企业家协会联合主办,它得到了中国驻英大使馆文化处、英国文化委员会、英国社会学会、中国世界政治研究等机构、学术团体和参与活动的所有支持和赞助单位的鼎力相助。
  •  演讲嘉宾
  1. 马丁·阿尔布劳( )教授,英国社会科学院院士;英国社会学会名誉副主席
  2. 邴正教授,中国吉林大学常务副校长;中国社会学会副会长
  3. 凯利·布朗教授,英国伦敦国王学院中国研究中心主任
  4. 科林·布拉德福德( )博士,美国布鲁金斯学会高级研究员
  5. 皮埃尔•卡蓝默( )先生, 瑞士梅耶人类进步基金会主席; 法国中欧社会论坛创始人
  6. 克莱门特 – 琼斯( )勋爵,英国议会跨党派中国小组副主席
  7. 英格丽·克兰菲尔德( )女士, 全球中国比较研究会理事,英国伦敦恩菲尔德市前副市长
  8. 吉尔•德拉诺瓦( )教授,法国巴黎政治学院政治研究中心主任
  9. 范丽珠教授,复旦大学社会发展与公共政策学院
  10. 冯琰博士, 英国威斯敏斯特大学中国传媒中心访问学者;中国传媒大学讲师
  11. 查尔斯·格兰特( ) 先生,欧洲改革中心主任;全球中国比较研究会信托人
  12. 郝斐,全球青年企业家协会 会长; 英国UVIC 集团总裁
  13. 伊莎贝尔•希尔顿(  )女士,中外对话创始人、主编
  14. 斯科特·拉什( )教授,伦敦大学哥德史密斯学院文化研究中心主任
  15. 孔令涛先生,孔子国际教育集团董事长、世界孔子基金会主席
  16. 柳宏教授,扬州大学文学院院长
  17.  刘晓明先生,中国驻英使馆大使
  18.  毛里奇奥•马里内利 (  ) 博士,英国萨塞克斯大学亚洲中心主任
  19.  阿洛克·夏尔马 ( )先生,英国国会下议院议员; 东西方领袖论坛创始人
  20.  山姆·威敏斯特 (  ) 教授, 《韦伯研究》主编; 伦敦都市大学全球政策研究所文化与现代化项目主任
  21.  姚文放教授,中国扬州大学文学院
  22.  于硕教授,香港理工大学中欧超文化对话中心代表; 法国中欧社会论坛共同创始人
  • 成果与出版

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    – 中国网w

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Wednesday, October 10, 2018

报告称印度小型城市的空气污染最为严重

印度的空气质量不断恶化。世界卫生组织( )本周发布的新数据显示,印度有14座城市入选全球污染最严重的30座城市榜单。

5月12日,世卫组织公布了全球103个国家3000座城市的空气悬浮微粒物含量数据。这些数据是大力整治雾霾过程中最常被引用靠近阿富汗边境的伊朗小城布尔位列30座城市榜首,印度城市瓜廖尔和阿拉哈巴德分列第2、3位。位列6、7两位的是印度小城巴特那和赖布尔,说明印度这个世界第二人口大国中的小型城市正在承受着严重雾霾和空气污染的影响。
“城市空气污染水平以惊人的速度上升,严重影响着人类的健康,”世界卫生组织主任玛利亚·奈拉说。

“与此同时,人们的环保意识正在加强,更多城市开始检测自身的空气质量。只要空气质量改善,全球呼吸系统和心血管相关的疾病就会减少,”奈拉补充道。


世卫组织报告称,每年空气污染导致全球超过300万例过早死亡,其中年轻人、老人以及贫困人口占大多数。

城市空气污染还会造成其他负面影响,例如PM10颗粒会使热量偏转,加剧城市地区气候变暖,导致低纬度地区发生气候变化

世界卫生组织报告还指出,随着城市空气质量的下降,中风、心脏病、肺癌以及哮喘等急慢性呼吸道疾病的发病率都上升了。

世卫组织数据显示,自2011年起,中国这个曾经几乎是空气污染代名词的国家
的空气质量已经有所改善,当然这也要归功于中国污染治理的起点较低。的数据。

数据显示,2008至2013年间,全球空气污染水平上涨了8%,发展中国家居民不得不承受煤炭、燃料、建材和化肥使用增多带来的严重影响。

这些人类活动在沙尘暴和干燥、静止的天气条件的共同影响下,造就了最严重的空气污染。
动者指出,直径较大的PM10颗粒(主要是粉尘、砂和烟灰)污染在印度也十分严重,这说明大小城市都应采取更加严厉的措施治理空气污染。

“这说明空气污染现在已经成了一场国家危机,需要印度全国所有城市采取更加严格、更加有力的治理措施,”科学与环境中心执行长萝伊乔杜莉
在一份声明中说。

印度首都德里于2014年被世界卫生组织列为全球污染最严重的城市之一。自此以后,德里市内的空气质量已经有了改善(同样地,德里污染治理的起点也比较低)。

目前,德里在全球30大污染最严重的城市中名列11,年平均PM2.5含量较2013年下降了20%。

空气污染治理政策已经开始生效,政府开始向卡车收取环境补偿费用,并且还针对其他污染源采取了相应措施。我们正在响应这些行动,但城市空气污染水平仍旧居高不下,这只能说明这些行动应该持续下去,直到达成我们的清洁目标,”萝伊乔杜莉告诉《印度时报》。

中国的城市集群

对中国而言,目前的情况说明
河北省仍有很多工作要做。上周,该省就因关闭污染工厂执行不力遭到中央环境保护督察组的批评。

中国有6座城市进入全球前30的名单,分别为邢台、保定、石家庄、邯郸、衡水和唐山。这些城市都是中国煤矿开采、钢铁、化工、水泥以及建筑材料行业的中心。中国中央政府正努力采取控制措施,解决这些行业面临的产能过剩以及污染问题,

冬天供暖使用老式的燃煤锅炉,车辆使用低质量的燃料,这些都是导致河北省污染的原因。

Friday, September 28, 2018

एक दिन की हड़ताल से करोड़ों की चपत

देश भर में केमिस्टों की हड़ताल का असर हिमाचल में भी दिखा। राज्य भर में हुई हड़ताल से एक दिन में केमिस्टों को करोड़ों की चपत लगी है। हड़ताल की वजह भारत सरकार की ओर से लिया गया ऑनलाइन दवा बिक्री का नया फैसला है। प्रदेश भर में हुई हड़ताल का असर राजधानी स्थित आईजीएमसी सहित कई अन्य सरकारी अस्पतालों में भी दिखा। सिविल सप्लाई की दुकानों में कई जरूरी दवाइयां मरीजों को नहीं मिलीं। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में कई ओपरेशन भी टालने पड़े। हालांकि एमर्जेंसी में सभी ओपरेशन किए गए।मुख्यालय नाहन में स्वच्छता पखवाड़े के तहत शुक्रवार को विधानसभा अध्यक्ष डॉ राजीव बिंदल के नेतृत्व में सफाई अभियान चलाया गया। सफाई अभियान में बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों और नगर परिषद के कर्मियों ने भाग लिया। इस दौरान शहर के माल रोड से लेकर शिमला रोड की सफाई की गई। साथ ही लोगों को सफाई पर जागरूक भी किया गया। इस मौके पर विधानसभा अध्यक्ष ने कहा की स्वच्छता बनाए रखने के लिए सभी के सहयोग की आवश्यकता है। सभी के सहयोग से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत का सपना साकार हो सकता है। उन्होंने सफाईर् को मिशन बनाने का आह्वान भी कियाप्रदेश में अपराध का बढ़ता साया चिंता का कारण बनता जा रहा है। लगभग हर दिन गंभीर अपराध सामने आ रहे हैं। यह सिलसिला पिछले एक-दो दशकों से लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इसके सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक कारणों की समीक्षा होनी चाहिए। इस मुद्दे को कतई तौर पर राजनीतिक दृष्टि से देखना और शासक दलों की निजी तू तू-मैं मैं में बदलकर रख देना वांछित नहीं होगा। इससे राजनीतिक दल मुद्दे से भटक कर अपनी-अपनी सफाई या बहादुरी बयां करने में ही सारी ऊर्जा खपा देते हैं और मुद्दा वहीं का वहीं रह जाता है। बिटिया प्रकरण हो या अपनी बूढ़ी मां को कैद करके झरोखे से रोटी डालते रहने का पशुतापूर्ण व्यवहार हो, हत्या और बजुर्गों व महिलाओं से अमानवीय व्यवहार के मामले बढ़ते जा रहे हैं। अवैध शराब, भांग और अन्य ड्रग्स का रोज पकड़ा जाना समाज में गैर कानूनी गतिविधियों में समाज की संलिप्तता बढ़ते जाने की कहानी बयां करता है। नया मामला 43 वर्षीय अनुसूचित जाति से संबंधित वकील केदार सिंह जिंदान की क्रूरतापूर्ण अमानवीय हत्या का है। दिनदहाड़े ऐसे अपराध की घटना का होना चिंता का विषय है। खासकर अपराधी का खुद यह कहना कि इस आदमी ने आरटीआई एक्ट का प्रयोग करके नाक में दम कर रखा था और लगातार धमकी देता था कि आपको सड़क पर लाकर छोडूंगा। इसी टकराव के चलते 7 सितंबर की सुबह पहले जिंदान को लाठी-डंडों से पीटा गया और बाद में गाड़ी से कुचल कर बकरास गांव में उसकी हत्या कर दी गई। जिंदान जिला सिरमौर के गांव पाब, पंचायत गुंदाहा, ब्लॉक शिलाई का रहने वाला था।
मुख्य अभियुक्त जय प्रकाश, जिसने जिंदान पर गाड़ी चढ़ाई, ने अपने खाते-जीते रिश्तेदारों के लिए बीपीएल परिवार के प्रमाण पत्र बनवा दिए थे, जिनके आधार पर उन्होंने सरकारी नौकरियां प्राप्त कर ली थीं। इस वर्ष जून मास में जिंदान ने शिमला में पत्रकार वार्ता करके आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी के आधार पर इन गलत बीपीएल प्रमाण पत्रों का भंडाफोड़ किया था, जिसके चलते जय प्रकाश के रिश्तेदारों को गलत प्रमाणपत्रों के आधार पर प्राप्त नौकरियों से हाथ धोना पड़ा था। इसके अलावा भी जिंदान ने कई रहस्योद्घाटन अपने इलाके की जन सेवाओं को लेकर किए थे। जिंदान अपने इलाके में भ्रष्टाचार और जाति आधारित भेदभाव के विरुद्ध एक सशक्त आवाज बन गया था। 14 सितंबर को मानवाधिकार संरक्षक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक 7 सदस्यीय दल ने मौके पर जाकर स्थानीय पंचायत, प्रशासन, जिंदान के परिवार के सदस्यों और स्थानीय समुदाय से बातचीत करके इन तथ्यों की जानकारी प्राप्त की। जिंदान के परिवार वालों ने बताया कि पिछले वर्ष भी जिंदान को सतौन में मारपीट कर रेत के ढेर में दबाकर मरने के लिए छोड़ दिया गया था, किंतु वह भाग्य से बच गया। उसने बहुत से लोगों की करतूतों का भंडाफोड़ किया था।
अतः कहीं न कहीं उन सभी की इस हत्या में संलिप्तता के कोण से भी जांच की जानी चाहिए। जिंदान तो वैधानिक सीमाओं के आधार पर सच्चाई को सामने लाने का प्रयास कर रहा था, यदि किसी को लगता था कि वह गलत तरीके से उन्हें तंग कर रहा है, तो उनके लिए भी कानून के दरवाजे खुले थे। वे पुलिस या न्यायालय की शरण में जाते, किंतु कानून को अपने हाथ में लेकर इस तरह का जघन्य अपराध करना क्षम्य नहीं हो सकता है। जिंदान के हत्यारों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302ए और अनुसूचित जाति व जन जाति (अत्याचार निरोध कानून) की धारा 3.2-5 के अंतर्गत मुकद्दमा दर्ज किया गया है, किंतु स्थानीय राजपूत सभा अनुसूचित जाति व जनजाति एक्ट के तहत मुकद्दमा दर्ज न करने की मांग कर रही है। ऐसी मांग संदेह को और बढ़ाती है कि इस मामले में जातीय कोण भी हो सकता है। जब पुलिस ने धारा लगाई है, तो पुलिस को निष्पक्ष कार्य करने देना चाहिए और उसके कार्य को इस तरह से प्रभावित करने के प्रयास शक को साबित करते हैं। इन दूर-दराज के अंदरूनी इलाकों में जातीय भेदभाव के मामले अकसर सामने आते रहते हैं। इसलिए एक ओर तो मुकद्दमे की निष्पक्ष जांच के बाद न्यायिक कार्रवाई को सुनिश्चित किया ही जाना चाहिए और दूसरी तरफ सामाजिक स्तर पर इन क्षेत्रों में जातिगत भेदभाव दूर करने के संगठित प्रयास करने की जरूरत है। इसकी पहल स्थानीय पंचायतों, सामाजिक संगठनों और सरकार को मिलकर करनी चाहिए।

Friday, September 14, 2018

हिंदी से प्रेम करते हैं तो इस प्रेस के बारे में ज़रूर जानिए

भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक कहे जाते हैं. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उन्होंने अलग-अलग विधाओं में लेखन किया.
महज पैंतीस साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई लेकिन उनके समय को हिंदी का भारतेंदु युग कहा जाता है. भारतेंदु और पटना का खास जुड़ाव रहा है.
जीवन काल में ही उन्होंने अपनी सारी रचनाओं का कॉपीराइट पटना की खड्गविलास प्रेस को दे दिया था.
रामदीन सिंह ने पटना में 1880 में खड्गविलास प्रेस की स्थापना की थी. प्रेस शुरू करने से पहले वे बिहार में हिंदी के लिए आंदोलन चला रहे थे.
साल 2000 में बिहार राष्ट्रभाषा
डॉक्टर एक्यू सिद्दीकी खड्गविलास की ऐतिहासिक अहमियत से अनजान हैं. इस प्रेस के बारे में उन्हें बस इतना ही पता है कि यहाँ कभी अंग्रेजों के सरकारी कागजात छपते थे.
वहीं जहाँ कभी यह मशहूर प्रेस हुआ करती थी उसी के पास की नवरंग गली में दिवंगत नन्द किशोर पांडेय का मकान है.
खड्गविलास प्रेस के पुराने कर्मचारियों में एक नन्द किशोर पांडेय भी थे. वे इस प्रेस में प्रूफ रीडर थे. इनके बेटे और संगीत शिक्षक उमेश कुमार पांडेय के पास उस ज़माने की धूमिल यादें ही बची हैं.
वे बताते हैं, "उस ज़माने में साहित्य और पत्रिकाओं के प्रकाशन के लिए यह प्रेस मशहूर थी. मैं भी कुछेक बार पिता जी के साथ प्रेस पर गया था. साधारण मगर प्रेस की बड़ी सी बिल्डिंग थी. नीचे छपाई का काम होता था और ऊपर लोग रहते थे."
परिषद् की किताब "आधुनिक हिंदी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका" प्रकाशित हुई थी. इसके लेखक डॉक्टर धीरेन्द्रनाथ सिंह हैं. इस किताब के मुताबिक यह आधुनिक हिंदी की पहली प्रेस थी. स किताब में धीरेन्द्रनाथ सिंह बताते हैं, "रामदीन सिंह के मित्र एवं कवि और नाटककार मझौली नरेश लाल खड्गबहादुर मल्ल भारतेन्दु के भी करीबी थे. उन्होंने ही रामदीन सिंह का परिचय भारतेन्दु से कराया था.रो. राम निरंजन परिमलेंदु बिहार सरकार के सर्वोच्च साहित्य सम्मान 'राजेंद्र शिखर सम्मान' से सम्मानित हिंदी साहित्य के इतिहासकार हैं.
वे खड्गविलास प्रेस को भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनाओं का कॉपीराइट मिलने के बारे में बताते हैं, "भारतेंदु हरिश्चंद्र उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हिंदी के सर्व्यमान्य नेता थे.
तब साहित्य के एक बड़े केंद्र बनारस के वो सबसे बड़े आकर्षण थे. भारतेंदु को आश्चर्यजनक ढंग से प्रसिद्धि मिल गई थी. लेकिन तब तक भारतेंदु शाहखर्च (बहुत अधिक ख़र्च करने वाला) होने और दूसरी वजहों से कर्ज में डूब गए थे. से में उस जमाने में रामदीन सिंह ने भारतेंदु को एक मुश्त चार हज़ार रूपये देकर उन्हें कर्ज से मुक्त किया. इतना ही नहीं इसके बाद भी रामदीन सिंह ने कई बार भारतेंदु की आर्थिक मदद की."
इस सम्बन्ध में धीरेन्द्रनाथ सिंह की किताब में भारतेंदु द्वारा तब के कलकत्ता के एक मित्र को पत्र लिखने का जिक्र है.
हिंदी दिवस पर मेरी प्रिय कविता
क्या होता है भारत में हिंदी मीडियम होने का दर्द?
प्रोफ़ेसर राम निरंजन परिमलेंदु बताते हैं, "1882 में मिले इस अधिकार-पत्र को उन्होंने अपने द्वारा प्रकाशित किताबों, पत्र-पत्रिकाओं में जमकर छापा. इस करार के बाद भारतेंदु जब भी पटना आते थे तो खड्ग विलास प्रेस में ही रुकते थे."
"अखिल भारतीय स्तर पर उस जमाने का शायद ही कोई ऐसा साहित्यकार रहा होगा जिसके रिश्ते इस प्रेस न रहे हों. यह प्रेस तब साहित्कारों का तीर्थ बन गई थी. 1935 तक इस प्रेस का स्वर्ण काल रहा."
भारतेंदु के निधन के बाद 1888 के करीब उनकी छह खण्डों वाली ग्रंथावली का प्रकाशन भी खड्गविलास प्रेस ने ही किया.
इसके नाटक, गद्य, काव्य खंड अलग-अलग थे. यह तब हिंदी में संभवतः किसी भी लेखक की प्रकाशित पहली ग्रंथावली थी.
इतना ही नहीं रामदीन सिंह की कोशिशों से भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रमाणिक और विस्तृत जीवनी का प्रकाशन भी हुआ. साल 1905 में शिवनंदन सहाय द्वारा सम्पादित 'सचित्र हरिश्चंद्र' का प्रकाशन खड्गविलास प्रेस ने किया था.
जिसमें वे लिखते हैं, "सम्प्रति रामदीन सिंह ने एक साथ चार हजार रुपये देकर मुझे उऋण किया है. वे 'क्षत्रिय पत्रिका' के संपादक हैं. अब मैं किसी को पुस्तकें छापने न दूंगा, प्रकाशित-अप्रकाशित समस्त पुस्तकों का स्वत्व भी इन्हीं को दिये देतारोफेसर राम निरंजन परिमलेंदु के मुताबिक सम्पूर्ण भारतीय भाषाओँ के इतिहास में कॉपीराइट का पहला मुकदमा भी इसी प्रेस की ओर से पटना में किया गया था. बनारस की भारत जीवन प्रेस ने भारतेंदु की 'अंधेर नगरी' नाटक की किताब बिना खड्गविलास प्रेस के अनुमति के छाप दी थी. ऐसे में खड्गविलास प्रेस ने भारत जीवन प्रेस पर कॉपीराइट का मुकदमा कर दिया.
मुकदमा पटना की अदालत में चला जिसमें खड्गविलास प्रेस की जीत हुई. पटना के जिला जज ने 17 दिसम्बर, 1886 को रामदीन सिंह के पक्ष में फैसला सुनाया.
परिमलेंदु बताते हैं, "इस पूरे मामले का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि सुनवाई के दौरान पटना आने पर भारत जीवन प्रेस के प्रोपराइटर रामकृष्ण वर्मा खड्गविलास प्रेस में आकर ही ठहरते थे."
"दोनों एक साथ कोर्ट जाते और वहां से अपने-अपने वकीलों के पास चले जाते. उस दौर का सामाजिक सौहार्द कुछ ऐसा था."
खड्गविलास प्रेस तब के भारत के गिने-चुने बड़े छापाखानों में से एक था. रामदीन सिंह का जन्म 1856 और उनकी मृत्यु 1903 में हुई. वे खुद भी एक लेखक थे.
परिमलेंदु का कहना है कि उन्होंने 1882 में बिहार दर्पण नाम से एक किताब लिखी थी जो हिंदी की पहली जीवनी पुस्तक है. इसमें गुरु गोविंद सिंह सहित कई हस्तियों और समाज सुधारकों की जीवनी छपी थी.
कहाँ से आए ज़िला दंडाधिकारी, सचिवालय जैसे शब्द
हिंदी साहित्य सम्मेलन या साड़ी सेल सेंटर?
आज पटना के अशोक राजपथ पर जहाँ बीएन कॉलेज है उसके सामने वाली गली में थोड़ा अन्दर जाने पर यह प्रेस था. आजादी के बाद साठ के दशक तक यह प्रेस वजूद में रहा लेकिन तब तक यहाँ साहित्य का प्रकशन बंद हो गया था, केवल छपाई के काम होते थे.
जिस मकान में यह प्रेस था वह अब बिक चुका है. डॉक्टर एक्यू सिद्दीकी ने यह मकान ख़रीदा और कुछ दिनों बाद उसी ज़मीन पर नर्सिंग होम की नई इमारत खड़ी की.
डॉक्टर सिद्दीकी ने बताया, "1988 में मैंने जब यह दोमंजिला बिल्डिंग खरीदी तब यह बहुत बुरी हालत में थी. लोग इस मकान को भुतहा बताते थे और कोई इसे लेने को तैयार नहीं था."
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' लिखित खड़ी बोली हिंदी के पहले महाकाव्य प्रिय-प्रवास का प्रकाशन भी 1915 में इसी प्रेस ने किया था.

Monday, September 10, 2018

यहां रहनेवाले हर इंसान को क्यों ऑपरेशन करवाना पड़ता है

निया में किसी भी जगह रहने के लिए कुछ शर्तें होती हैं. कुछ क़ानूनी ज़िम्मेदारियों होती हैं. जैसे भारत में रहने के लिए हर भारतीय के पास आधार नंबर होना 'ज़रूरी' (मामला न्यायालय में) है. विदेशियों के पास यहां रहने के लिए अपने मुल्क का पासपोर्ट और भारत से वीज़ा मिलना ज़रूरी है.
लेकिन अंटार्कटिका में एक बस्ती ऐसी भी है जहां लंबे वक़्त के लिए रहना है तो अपनी अपेंडिक्स को ऑपरेशन कर के हटवाना ज़रूरी शर्त है.
अंटार्कटिका बेहद सर्द महाद्वीप है. यहां लोग कुछ महीनों के लिए ही रहते हैं. मगर, इस सर्द वीराने में भी इंसानों की कुछ बस्तियां आबाद हैं. ऐसी ही एक बस्ती है विलास लास एस्ट्रेलास.
ये अंटार्कटिका का वो इलाक़ा है जहां या तो रिसर्च के मक़सद से वैज्ञानिक रहते हैं, या फिर चिली की वायु सेना और थल सेना के जवान रहते हैं.
ज़्यादातर सैनिक यहां आते-जाते रहते हैं. लेकिन बहुत से वैज्ञानिक और सैनिक यहां लंबे समय से रह रहे हैं. वो यहां अपना परिवार भी साथ ले आए हैं. विलास लास एस्ट्रेलास की आबादी बमुश्किल सौ लोगों की होगी.
हालांकि यहां किसी बड़े गांव या छोटे शहर जैसी सुविधाएं नहीं हैं. फिर भी ज़रूरत के मुताबिक़ जनरल स्टोर, बैंक, स्कूल, छोटा-सा पोस्ट ऑफ़िस और अस्पताल बना दिए गए हैं.
स्कूलों में बच्चों को बुनियादी तालीम तो मिल जाती है, लेकिन अस्पतालों में इलाज बहुत ही सतही मिलता है. अंटार्कटिका में एक बड़ा अस्पताल है, लेकिन वो विलास लास एस्ट्रेलास गांव से एक हज़ार किलोमीटर दूर है.
रास्ते भर बर्फ़ के पहाड़ों से होकर गुज़रना पड़ता है. ये बड़ा अस्पताल भी शहर के किसी मल्टी स्पेशियालिटी अस्पताल जैसा नहीं है. बेस के अस्पताल में चंद ही डॉक्टर हैं और वो भी माहिर सर्जन नहीं हैं. इसीलिए किसी भी तरह की इमरजेंसी से बचने के लिए लोगों को अपेंडिक्स का ऑपरेशन करवाना ज़रूरी होता है.
यहां के लोगों की ज़िंदगी जितनी अद्भुत है, उससे भी ज़्यादा अद्भुत है ये जगह. अलग-अलग दिशाएं बताने वाले निशानों को देखकर ही अंदाज़ा हो जाता है कि ये जगह घनी आबादी से कितनी दूर है.
मिसाल के लिए बीजिंग यहां से क़रीब 17,501 किलोमीटर दूर है. ज़रूरत का सामान यहां सेना के विशाल हवाई जहाज़ अमरीकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन के बनाए मालवाहक विमान सी-130 हर्क्यूलिस से लाया जाता है. आसपास के इलाक़ों में चलने के लिए  ट्रक और राफ़्टिंग बोट की ज़रूरत पड़ती है.
इस इलाक़े का औसत तापमान साल भर माइनस 2.3 सेल्सियस रहता है जो कि अंटार्कटिका के मुख्य इलाक़े के तापमान के मुक़ाबले काफ़ी गर्म है.
बर्फ़ की चट्टानों से लगी कुछ इमारतें भी हैं जिनके अंदर का तापमान बाहर के मुक़ाबले बेहतर होता है. बिल्डिंगों के अंदर सजावट भी बेहतर है. दीवारों पर कुछ ख़ास यादगार तस्वीरें लटकी दिख जाती हैं. इनमें एक तस्वीर मशहूर वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग्स की भी लगी है.
सर्जियो क्यूबिलोस चिली के एयरफ़ोर्स बेस के कमांडर हैं. वो यहां क़रीब दो साल से अपनी पत्नी और बच्चे के साथ रह रहे हैं. हालांकि उनका परिवार कुछ दिन के लिए चिली लौट गया था, लेकिन ख़ुद सर्जियो दो साल से यहीं पर हैं.
अपने तजुर्बे के आधार पर वो कहते हैं कि यहां सर्दी का मौसम झेलना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि सर्दी में तापमान माइनस 47 डिग्री तक पहुंच जाता है. ऐसे में कई-कई दिन घर में ही क़ैद रहना पड़ता है.
वो कहते हैं कि अब तो उनके परिवार को भी यहां का मौसम झेलने की आदत हो चुकी है. वो अब ना सिर्फ़ मौसम का मज़ा लेते हैं बल्कि अन्य सैनिकों के परिवारों के साथ हैलोवीन जैसे त्यौहार भी मनाते हैं.
परिवार के साथ रहने वालों को एक और बात का ख़्याल रखने की सलाह दी जाती है. ख़ासतौर से सैन्य बेस में रहने वालों को हिदायत दी जाती है कि उनकी पत्नी गर्भवती ना हो क्योंकि मेडिकल सुविधा के अभाव में कोई भी बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है.
यहां पेंगुइन को इंसानों से ख़तरा नहीं है. वो बेख़ौफ़ घूमती हैं. लेकिन तापमान ज़्यादा गिरने पर मरती भी ख़ूब हैं. तापमान गिरने पर समुद्र में भी बर्फ़ जम जाती है.
सैन्य बेस से काफ़ी दूरी पर ऊंचाई वाले इलाक़े पर ट्रिनिटी नाम का एक रूसी चर्च है. बताया जाता है कि इसे रूस के एक रूढ़िवादी पादरी ने बनाया था.
विलास लास एस्ट्रेलास दुनिया का ऐसा हिस्सा है जहां किसी और ग्रह पर रहने का अनुभव किया जा सकता है. इसमें कोई शक नहीं कि यहां रहना एक चुनौती भरा काम है. लेकिन यहां रहने वालों को जिस तरह की ज़िंदगी का तजुर्बा होगा वो दुनिया के किसी और इंसान को नहीं हो सकता.
उत्तर कोरिया ने अपने 70वें स्थापना दिवस समारोह के दौरान आयोजित सैन्य परेड के दौरान इंटर कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (आईसीबीएम) का प्रदर्शन नहीं किया है.
हालांकि अभी यह अस्पष्ट है कि उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन ने इस कार्यक्रम के दौरान कोई भाषण दिया था या नहीं.
उत्तर कोरिया के सैन्य हथियारों और परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर उसकी प्रतिबद्धता को जानने के लिए परेड पर पूरी दुनिया की निगाहें लगी हुई थी.
कुछ विश्लेषकों ने उम्मीद जताई थी कि किम जोंग उन अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के साथ शिखर वार्ता के बाद अपने हथियारों का प्रदर्शन करना कम कर देंगे.
यदि इस परेड में उस आईसीबीएम का प्रदर्शन किया जाता जिसमें अमरीकी धरती तक मार करने की क्षमता है तो उसे उकसाने वाला कदम माना जाता.
न्यूज एजेंसी एएफपी ने इस परेड की कोई तस्वीर जारी नहीं की है. हालांकि उनका एक फ़ोटो जर्नलिस्ट इस परेड को कवर कर रहा था.
एनके न्यूज़ जिसके पास सरकारी टीवी से मिली तस्वीरें थीं, उन्होंने परेड में आईसीबीएम के नहीं शामिल किए जाने की पुष्टि की है.
जून में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की मौजूदगी में उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग उन ने कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु मुक्त बनाने को लेकर एक अज्ञात समझौते पर दस्तखत किए थे, लेकिन इसे पूरा करने के लिए कोई समयसीमा, इसकी रूपरेखा और प्रक्रिया तय नहीं की गई थी.
तब से दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय बातचीत चलती रही, लेकिन हाल ही में अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो की निर्धारित यात्रा आखिरी समय में रद्द कर दी गई और दोनों देशों ने एक दूसरे पर समझौता वार्ता में रुकावट डालने का आरोप लगाया.
हालांकि दोनों ने यह भी कहा कि वो विकास के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
सियोल स्थित बीबीसी संवाददाता लौरा बिकर ने कहा कि यदि उत्तर कोरिया इस परेड में आईसीबीएम को प्रदर्शित करता तो इससे भविष्य में समझौता वार्ता की संभावना ख़त्म हो जाती.त्तर कोरिया में उनका सबसे बड़ा खेल आयोजन भी होना है जो पिछली बार 2013 में हुआ था.
बड़े स्तर पर होने वाला यह खेल आयोजन इस देश की अच्छी छवि के प्रचार के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है.
इस साल के आयोजन का नाम द ग्लोरियस कंट्री रखा गया है जिसमें उत्तर कोरिया के इतिहास से जुड़ी प्रतीकात्मक कहानियां बताई जाएंगी.
पिछले दो हफ़्तों से उपग्रहों से मिल रही तस्वीरों के मुताबिक इस वर्ष यह खेल बहुत बड़े स्तर पर आयोजित किया जा रहा है जो सितंबर के पूरे महीने में चलता रहेगा.
इससे पहले आयोजित खेल बहुत बड़े स्टेडियमों में लयबद्ध जिम्नास्टिक और तालमेल के साथ डांस के प्रदर्शन के साथ किए थे.
इन रंगारंग कार्यक्रमों के बहुत भव्य होने की उम्मीद है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने पहले कहा था कि इन खेलों में और इसकी तैयारी में बच्चों को भाग लेने के लिए बाध्य किया जाता है.
बताया जा रहा था कि इस परेड के लिए पिछले छह महीने से तैयारियां चल रही थीं. उत्तर कोरिया की सरकारी मीडिया ने इस परेड को "जीत का जश्न और देश की अर्थव्यवस्था के तेज़ी से होते विकास को दर्शाने वाला" क़रार दिया है.
कई विश्लेषकों का मानना है कि किम जोंग-उन ऐसी उपलब्धि चाहते हैं जो उनके पिता और दादा भी हासिल नहीं कर पाए- वो कोरिया के युद्ध की समाप्ति की घोषणा करना चाहते हैं.
ये युद्ध एक सैन्य समझौते के बाद 1953 में ख़त्म हो गया था. लेकिन कभी कोई शांति समझौता नहीं हुआ.
अमरीका के साथ बातचीत अटकने के बाद किम जोंग-उन ने इस हफ़्ते दक्षिण कोरिया के प्रतिनिधिमंडल का अपने देश में स्वागत किया और कोरियाई प्रायद्वीप को "परमाणु-मुक्त कराने की अपनी प्रतिबद्धता" को दोहराया.
दक्षिण कोरिया के अधिकारियों के मुताबिक किम इस बात से परेशान हैं कि उनकी सकारात्मक कोशिशों पर दुनिया भरोसा नहीं कर रही है.
वो अमरीका के साथ रिश्ते बेहतर करने की इच्छा जता चुके हैं. वो जानते हैं कि ऐसा करने के लिए परमाणु निरस्त्रीकरण पहली शर्त है.
किम ट्रंप के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं. ट्रंप भी ट्वीट कर जवाब दे चुके हैं कि "वो साथ मिलकर ये करने को तैयार हैं."
हालांकि इन कोशिशों की राह में अब भी एक बड़ा रोड़ा है. किम जोंग-उन उत्तर कोरिया के अबतक के सबसे खुले विचारों के नेता तो दिखना चाहते हैं, लेकिन वो दुनिया को अब भी उत्तर कोरिया का एक सीमित रूप ही दिखाना चाहते हैं. और विदेशी मीडिया को परेड के लिए आमंत्रित करना एक ऐसा ही क़दम है.

Tuesday, September 4, 2018

निजाम म्यूजियम से सोने का 2kg का टिफिन बॉक्स सहित करोड़ों का सामान चोरी


सचिन तेंदुलकर ने स्वयं भी काफी कम उम्र में ही सफलता हासिल कर ली थी और उन्हें पृथ्वी शॉ की विलक्षण प्रतिभा को पहचाने में भी अधिक समय नहीं लगा. तेंदुलकर ने पृथ्वी की प्रतिभा को आठ साल की उम्र में ही पहचान लिया था और उन्होंने उसे कहा था कि कोई कोच उसकी नैसर्गिक तकनीक को नहीं बदले.
आखिरी 2 टेस्ट के लिए टीम इंडिया में हनुमा-पृथ्वी को मौका, मुरली विजय बाहर
तेंदुलकर अपने अपनी ऐप ‘100 एमबी’ पर कहा, ‘मैंने उसे कहा था कि भविष्य में उसके कोच उसे जितने की निर्देश दें वह अपनी ग्रिप या स्टांस नहीं बदले. अगर कोई तुम्हें ऐसा करने के लिए कहे तो उसे कहना कि वह मझसे से बात करे. कोचिंग देना अच्छा होता है, लेकिन किसी खिलाड़ी में अत्यधिक बदलाव करना नहीं.’
इस पूर्व महान बल्लेबाज ने कहा, ‘यह बेहद महत्वपूर्ण है कि जब आप ऐसे विशेष खिलाड़ी को देखें, तो कुछ बदलाव नहीं करें. यह भगवान का तोहफा है.’
तेंदुलकर ने कहा, ‘लगभग 10 साल पहले मेरे एक मित्र ने मुझे युवा पृथ्वी को खेलते हुए देखने को कहा. उसने मुझे कहा कि मैं उसके खेल का आकलन करूं और उसे कुछ सलाह दूं. मैंने उसके साथ सत्र में हिस्सा लिया और खेल में सुधार के लिए कुछ चीजें बताईं.’
पृथ्वी शॉ को पहली बार खेलते हुए देखने के बाद तेंदुलकर ने अपने मित्र से कहा था, ‘तुम देख रहे हो? यह भविष्य का भारतीय खिलाड़ी है.’ इस साल 18 साल के पृथ्वी की अगुआई में भारत ने अंडर 19 विश्व कप जीता. उन्होंने 14 प्रथम श्रेणी मैचों में सात शतक की मदद से 56.72 की औसत के साथ 1418 रन बनाए हैं.
उत्तर प्रदेश में तराई का एक जिला है. नाम है बलरामपुर. यहां के अचानकपुर इलाके के नंदपुर गांव के लोगों ने एक बुजुर्ग की मॉब लिंचिंग की कोशिश की है. और ये मॉब लिंचिंग की कोशिश इस बार किसी मुस्लिम के साथ नहीं बल्कि हिंदू के साथ हुई है. और इस बार भी मॉब लिंचिंग की वजह एक गाय बनी है.
देहात कोतवाली इलाके के लक्ष्मणपुर गांव के रहने वाले कैलाश नाथ शुक्ल 30 अगस्त की शाम को करीब पांच बजे अचानकपुर नंदपुर गांव से गाय लेकर जा रहे थे. उनकी गाय बीमार थी, जिसके इलाज के लिए वो उसे जुआथान श्रीनगर लेकर जा रहे थे. अचानक से गाय ने उनके हाथ से जंजीर छुड़ा ली और भागने लगी. कैलाश नाथ ने गाय का पीछा किया और उसे पकड़ लिया. पूरी घटना गांव के लोग देख रहे थे. अचानक से गांव के ही कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया और पिटाई करने लगे. बदमाशों का मन इतने से भी नहीं भरा तो 70 साल के बुजुर्ग कैलाश को उन्होंने गाय की ही जंजीरों से बांध दिया, सिर मुंडवा दिया और कालिख पोतकर पूरे गांव में घुमाया. इसके बाद बदमाशों ने बुजुर्ग को एक गड्ढे में धकेल दिया. वहां से किसी तरह बदमाशों के चंगुल से निकलकर कैलाश शुक्ल देहात कोतवाली पहुंचे और बदमाशों के खिलाफ तहरीर दी. एसपी राजेश कुमार के मुताबिक पिटाई के आरोपियों दिनेश शुक्ल, उमेश तिवारी, जीवनलाल और ननकने को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है. वहीं कैलाश नाथ शुक्ल को जिला मेमोरियल अस्पताल में भर्ती करवाया गया है.

Thursday, August 30, 2018

我为什么抗议马云狩猎?

中国富豪、阿里巴巴董事局主席马云英国狩猎,遭遇中国环保人士抗议。

有英国媒体道,两年前,马云花费3.6万英镑,于苏格兰一个小村落租了一座城堡,与11位朋友共同打猎,一周内猎取17只雄鹿。

中国环保组织“自然大学”随后发公开信,表示抗议,称其行为将激发中国富豪狩猎热,对野生动物保护工作产生负面影响。

抗议马云狩猎
,有可能意味着“自然大学”以后将得不到阿里巴巴公益基金会的资助。但“自然大学”创办人冯永锋并不后悔。他说,环保组织是要有态度的,对某个问题有看法和判断,就要及时说出来。一个行业的健康,也需要这样的深度互动。这才是真正的团结。

中外对话采访了冯永锋。

中外对话:有网民认为,“自然大学”抗议马云狩猎是在“捏软柿子”, 与其向马云抗议,不如要求欧、美、非洲等地区跟中国一样禁止狩猎。您怎么看待“捏软柿子”?

冯永锋:在中国,环保组织经常要打“遭遇战”,每天会发生什么事,你根本没法预料到。遭遇了,就要表态,就要表达,就要干预。“自然大学”是一家以行动干预加行动研究见长的组织,我们每天都在针对事件做积极的回应。我们一年介入类似的事件成百起。马云只是一个小案例而已,他不是“软柿子”也不是“硬柿子”。从环保角度来说,这也算不上什么特色案例,只是我们诸多遭遇战中的一个小战役。没什么大惊小怪的。

我们当然也在调研中国的狩猎问题,虽然做得并不持续。我们这两年干预的大量野生动物尤其是鸟类的保护案例,已经足以证明,中国的野生动物每天都在遭遇各种残酷的捕杀。没有一个物种不是在中国人的威逼下苟延残喘。一些具体的调查结果我们也会陆续公布。

中外对话:允许中国富人去英国等发达国家狩猎,是不是一件好事,毕竟还有很多运动狩猎爱好者,中国富人也是人,也有享受合法爱好和运动狩猎的权利。他们去管理规范的国家狩猎,能否减轻中国野生动物保护的压力?

冯永锋不可能,打哪国的动物都是杀害动物。而且要命的是,这些人不会因为到了国外打猎,就学会了尊重自然和保护环境,相反,他们只是过了一把开枪的杀戮瘾而已。

中外对话:说中国不适合狩猎,“自然大学”有过详细调查吗?

冯永锋中国物种的灭绝速度,估计是全世界最快的。原因很简单,一是自然栖息地的大量散失和破碎化,二是各种形式的捕杀和食用,三是无止境的人工养殖许可导致野外种群被大量捕捉,四是各种动物园、标本爱好者、宠物爱好者的大量购买和消费。

我们当然不可能对国内的所有情况进行调查。但我们每天都在干预各种遭遇到的野生动物伤害事件,也和全国的关注动物保护的组织有密切来往。中国这片土地上,对野生动物每天都发生着什么事,我们应当是极清楚的。

中外对话:马云对中国环保事业是有贡献的,因其两年前在英国的一次并不违法的狩猎经历,而严加指责,这对马云是不是不公平?从团结环保人士的角度来看利弊如何?

冯永锋马云的阿里巴巴基金会正在尝试资助中国的民间环保组织,他们的探索我们是看在眼里的。但马云过度相信了“世界先进”,耗巨资去和大自然保护协会( )来往,我觉得这个做很愚蠢。因为中国的环境保护,希望一定在中国的“草根”组织身上。你不全力支持“草根”,却花这么高的学费去学些可能根本用不上的“先进技能”,我认为得不偿失。

环保组织是要有态度的,你对某个问题有看法和判断,就要及时地说出来。一个行业的健康,也需要这样的深度互动。这才是真正的团结。如果说担心他们以后不资助 “自然大学”,就不敢说话了,这不是我们的风格。虽然,明快表达是一定会有代价的。确实有可能,阿里巴巴公益基金会,会因为我们的批评表态,而不愿意再资助我们。

中外对话:有观点认为,把运动狩猎绝对化加以否定,仅从这点来看,就暴露出中国环保组织的一个软肋:做事缺乏理性和科学精神,更多的是凭热情和理想在干。在中国做环保,最需要的是什么?

冯永锋:理性和科学往往是最大的假象,那些说别人不理性不科学的人,自己也理性不到哪去,科学不到哪去。他们用来推理和试图压服他人的证据,要么是古代的片面说道根本站不住脚,要么是别国的探索完全与本国不沾边,要么是“大胆的假设”根本无法在现实中推行,要么是必须满足诸多不可能的条件下的狭窄可能。

我觉得,中国的问题在中国,解决中国问题的出路和智慧也都在中国。永远面对现实的环境问题,老实地去干预和改良,这是中国民间环境保护的唯一出路。这几年,我们还是很可悲地发现,这样工作的民间组织太少。现实问题都不去参与解决,理性和科学有何意义?何况,做公益、做环保,本来也不可能只靠理性和科学,在我看来,理性和科学在环境保护中的作用,最多只占10%,其他的90%,都是靠勇敢、智慧、笨重的行动和韧性。

Tuesday, August 28, 2018

धनवान सऊदी अरब बलवान क्यों नहीं बन पा रहा?

मन मध्य-पूर्व का एक छोटा-सा ग़रीब देश है. इसके ख़िलाफ़ अरब के अमीर देश सालों से यु्द्ध कर रहे हैं. यमन के ख़िलाफ़ सऊदी अरब इस युद्ध का नेतृत्व कर रहा है.
सऊदी के पास यमन में उसके दुश्मनों की तुलना में ज़्यादा बेहतर हथियार हैं, लेकिन हैरान करने वाली बात है कि वो इस युद्ध को जीतने के बजाय लगातार उलझता जा रहा है.
सऊदी का दक्षिणी प्रांत नजरान यमन की सीमा से लगा है. कर्नल मसूद अली अल-शवाफ़ यहां से यमन के ख़िलाफ़ ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे हैं.
उन्होंने ब्लूमबर्ग से कहा है कि इस युद्ध के शुरू होने के बाद से ख़तरे बदल गए हैं. उन्होंने कहा कि सऊदी को जो नुक़सान उठाने पड़ रहे हैं इससे भी ये साबित होता है कि यह कोई एकतरफ़ा युद्ध नहीं है.
आख़िर ऐसा क्यों है? सऊदी के पास पैसे की कमी नहीं है, अत्याधुनिक हथियार हैं फिर भी उसकी सेना यमन से युद्ध क्यों नहीं जीत पा रही है?
सऊदी अरब के लिए बड़ी चुनौती है कि वो तेल के बेशुमार पैसे को आर्मी की ताक़त के रूप में तब्दील करे.
सऊदी के बारे में कहा जाता है कि वो पैसे से सब कुछ नहीं ख़रीद सकता. इसलिए यह बात भी कही जाती है कि वो धनवान तो है पर बलवान नहीं.
मध्य-पू्र्व मामलों के विशेषज्ञ क़मर आगा कहते हैं कि सऊदी की सेना बहुत कमज़ोर है. उसे कोई ट्रेनिंग नहीं है कि अत्याधुनिक हथियारों को चला सके.
वो कहते हैं कि ''इसकी एक मुख्य वजह ये भी है कि सऊदी का शाही परिवार इस बात से डरा रहता है कि आर्मी मज़बूत हुई तो तख्तापलट भी हो सकता है. इसलिए सऊदी अपनी सुरक्षा और सेना की ज़रूरतों के लिए अमरीका और पाकिस्तान पर निर्भर रहता है.''
यमन के ख़िलाफ़ लड़ाई में सऊदी कितना खर्च कर चुका है इसकी जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है. लेकिन पिछले दो सालों में सऊदी के कुल विदेशी धन में 200 अरब डॉलर की गिरावट से साफ़ है कि उसे जमकर आर्थिक नुक़सान हो रहे हैं.
सऊदी अरब ने यमन में मार्च 2015 में हस्तक्षेप शुरू किया था. सऊदी के नेतृत्व वाले सैनिकों ने हवाई हमले शुरू किए थे और छोटी संख्या में ज़मीन पर भी अपने सैनिकों को भेजा था.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इसी साल मार्च महीने में कहा था कि सऊदी अरब अमरीकी हथियारों का बड़ा ख़रीदार है. पिछले साल अमरीका ने सऊदी को हथियारों की ख़रीद पर 3.5 अरब डॉलर की छूट दी थी.
यह छूट 15 अरब डॉलर के एंटी-मिसाइल सिस्टम पर थी. अगर सऊदी के पास अमरीका के इतने अच्छे हथियार हैं तो उसकी सेना कमज़ोर क्यों है? सऊदी का शुमार दुनिया के उन देशों में है जो रक्षा पर मोटी रक़म खर्च करता है.
वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट में इराक़, ईरान और फ़ारस की खाड़ी के सैन्य और रक्षा विशेषज्ञ माइकल नाइट्स का कहना है, ''यह सच है कि ईरान सऊदी से सैन्य ताक़त के मामले में आगे है.''
वो कहते हैं, ''ईरान की सेना में आपको कोई ऐसा नहीं मिलेगा जो ज़मीन पर कहता हो कि उसे सऊदी की सेना से डर लगता है. इसे यमन में सऊदी के सैन्य हमले से भी समझा जा सकता है. कई सालों से युद्ध जारी है, लेकिन सऊदी को कुछ हासिल नहीं हुआ.''
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी की सेना बहुत बड़ी है इसलिए यहां गुणवत्ता पर ज़ोर कम है. दूसरी समस्या यह है कि सऊदी की सेना आज भी पारंपरिक युद्ध के हिसाब से ही तैयार है और उसे 21वीं सदी के प्रॉक्सी वॉर का सामना करना हो तो फँस जाएगी.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार सऊदी 2015 और 2016 में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश था. 2002 के बाद सऊदी के हथियार आयात में 200 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
ऐसा भी नहीं है कि सऊदी कम गुणवत्ता वाले हथियारों को ख़रीदता है. सऊदी का ज़्यादातर हथियार सौदा अमरीका से है. यहां तक कि 2016 में अमरीका ने अपने कुल हथियारों की बिक्री का 13 फ़ीसदी सौदा सऊदी अरब से किया.
सऊदी के रॉयल एयरफ़ोर्स के पास यूरोफ़ाइटर टाइफ़ून भी हैं. इसके साथ ही अमरीकी एफ़-15 इगल्स भी हैं. ये सभी अत्याधुनिक लड़ाकू विमान हैं. सऊदी का शुमार उन देशों में है जिनके पास बेहतरीन हथियार हैं.
इतना कुछ होने के बावजूद यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों पर सऊदी भारी नहीं पड़ पा रहा है. हूती सऊदी के ख़िलाफ़ बड़े हमले करने में कामयाब रहे हैं. यहां तक कि हूती विद्रोहियों ने सऊदी के भीतर भी हमले किए हैं.
सबसे शर्मनाक तो यह है कि न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार हूती की एक बैलिस्टिक मिसाइल सऊदी की राजधानी रियाद के एयरपोर्ट पर गिरी थी. शुरू में सऊदी ने इससे इनकार किया था.
माइकल नाइट्स ने बिज़नेस इनसाइडर से कहा है, ''सऊदी ने यमन में केवल हवाई हमले का सहारा लिया है. अगर उसके पास सैन्य ताक़त है तो क्यों नहीं यमन की ज़मीन पर अपने सैनिकों को उतार रहा है.'' नाइट का कहना है कि ज़मीन पर लड़ने के लिए अनुभव और ट्रेनिंग की ज़रूरत होती है जो कि सऊदी की सेना के पास है नहीं.''
वो कहते हैं, ''सऊदी की सेना के पास असाधारण ऑपरेशन का बिल्कुल अनुभव नहीं है. इसे इराक़ के उदाहरण से भी समझ सकते हैं. इराक़ में सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ जब अमरीका ने हमला किया तो उसने कोशिश की थी कि सऊदी की सेना भी साथ दे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया था. सऊदी ने इस युद्ध में कोई योगदान नहीं दिया था.''
सऊदी अरब की थल सेना के बारे में कहा जाता है कि वो प्रशिक्षित नहीं है और ऐसे में यमन की ज़मीन पर जाकर लड़ना उसके लिए आसान नहीं है.
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट में डिफेंस एंड सिक्यॉरिटी प्रोग्राम के निदेशक बिलाल साब कहते हैं, ''सऊदी इस बात को समझता है कि यमन में हूती विद्रोहियों से ज़मीन पर जाकर लड़ना आसान नहीं है. अगर सऊदी ऐसा करता है तो उसे ना भारपाई होने वाला नुक़सान उठाना होगा.'' ई सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी को अपनी सेना का आकार छोटा करना चाहिए. इन सैन्य विशेषज्ञों में नाइट्स भी शामिल हैं. नाइट्स का कहना है कि सऊदी को सेना में गुणवत्तापूर्ण बहाली और प्रशिक्षण पर ध्यान देने की ज़रूरत है.
उसे ऐसी यूनिट्स बनानी चाहिए जो पड़ोसी देशों के साथ युद्धाभ्यास करे. यमन में सऊदी की स्थिति को देख कहा जा रहा है कि मध्य-पूर्व में ईरान का प्रभाव बढ़ रहा है.
सऊदी लंबे समय से हथियार बेचने वालों का पसंदीदा देश रहा है. इस मामले में वो अमरीका का दुलारा है. राष्ट्रपति ट्रंप ने 110 अरब डॉलर के सैन्य समझौते की घोषणा की थी. 32 साल के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान चाहते हैं कि वो अपने ही देश में हथियार बनवाएं. वो चाहते हैं कि 2030 तक सऊदी अपने ही घर में ज़रूरत के कम से कम आधा हथियार बनाए.
अगर ऐसा होता है तो आने वाले समय में पता चल पाएगा कि सऊदी अरब सैन्य दृष्टिकोण से कितना मज़बूत और प्रभावी हो पाता है और यमन में कोई निर्णायक भूमिका निभा पाता है.