देश भर में केमिस्टों की हड़ताल का असर हिमाचल में भी
दिखा। राज्य भर में हुई हड़ताल से एक दिन में केमिस्टों को करोड़ों की चपत
लगी है। हड़ताल की वजह भारत सरकार की ओर से लिया गया ऑनलाइन दवा बिक्री का
नया फैसला है। प्रदेश भर में हुई हड़ताल का असर राजधानी स्थित आईजीएमसी
सहित कई अन्य सरकारी अस्पतालों में भी दिखा। सिविल सप्लाई की दुकानों में
कई जरूरी दवाइयां मरीजों को नहीं मिलीं। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में
कई ओपरेशन भी टालने पड़े। हालांकि एमर्जेंसी में सभी ओपरेशन किए गए।मुख्यालय नाहन में स्वच्छता पखवाड़े के तहत शुक्रवार को विधानसभा अध्यक्ष
डॉ राजीव बिंदल के नेतृत्व में सफाई अभियान चलाया गया। सफाई अभियान में
बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों और नगर परिषद के कर्मियों ने भाग लिया। इस दौरान शहर के माल रोड से लेकर शिमला रोड की सफाई की गई। साथ ही लोगों को
सफाई पर जागरूक भी किया गया। इस मौके पर विधानसभा अध्यक्ष ने कहा की
स्वच्छता बनाए रखने के लिए सभी के सहयोग की आवश्यकता है। सभी के सहयोग से
ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत का सपना साकार हो सकता है।
उन्होंने सफाईर् को मिशन बनाने का आह्वान भी कियाप्रदेश में अपराध का बढ़ता साया चिंता का
कारण बनता जा रहा है। लगभग हर दिन गंभीर अपराध सामने आ रहे हैं। यह सिलसिला
पिछले एक-दो दशकों से लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इसके सामाजिक, आर्थिक,
सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक कारणों की समीक्षा होनी चाहिए। इस मुद्दे को कतई तौर पर राजनीतिक दृष्टि से देखना और शासक दलों की निजी तू तू-मैं मैं
में बदलकर रख देना वांछित नहीं होगा। इससे राजनीतिक दल मुद्दे से भटक कर
अपनी-अपनी सफाई या बहादुरी बयां करने में ही सारी ऊर्जा खपा देते हैं और
मुद्दा वहीं का वहीं रह जाता है। बिटिया प्रकरण हो या अपनी बूढ़ी मां को
कैद करके झरोखे से रोटी डालते रहने का पशुतापूर्ण व्यवहार हो, हत्या और बजुर्गों व महिलाओं से अमानवीय व्यवहार के मामले बढ़ते जा रहे हैं। अवैध
शराब, भांग और अन्य ड्रग्स का रोज पकड़ा जाना समाज में गैर कानूनी
गतिविधियों में समाज की संलिप्तता बढ़ते जाने की कहानी बयां करता है। नया
मामला 43 वर्षीय अनुसूचित जाति से संबंधित वकील केदार सिंह जिंदान की
क्रूरतापूर्ण अमानवीय हत्या का है। दिनदहाड़े ऐसे अपराध की घटना का होना
चिंता का विषय है। खासकर अपराधी का खुद यह कहना कि इस आदमी ने आरटीआई एक्ट
का प्रयोग करके नाक में दम कर रखा था और लगातार धमकी देता था कि आपको सड़क
पर लाकर छोडूंगा। इसी टकराव के चलते 7 सितंबर की सुबह पहले जिंदान को
लाठी-डंडों से पीटा गया और बाद में गाड़ी से कुचल कर बकरास गांव में उसकी
हत्या कर दी गई। जिंदान जिला सिरमौर के गांव पाब, पंचायत गुंदाहा, ब्लॉक
शिलाई का रहने वाला था।
मुख्य अभियुक्त जय प्रकाश, जिसने जिंदान पर गाड़ी चढ़ाई, ने अपने खाते-जीते रिश्तेदारों के लिए बीपीएल परिवार के
प्रमाण पत्र बनवा दिए थे, जिनके आधार पर उन्होंने सरकारी नौकरियां प्राप्त
कर ली थीं। इस वर्ष जून मास में जिंदान ने शिमला में पत्रकार वार्ता करके
आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी के आधार पर इन गलत बीपीएल प्रमाण
पत्रों का भंडाफोड़ किया था, जिसके चलते जय प्रकाश के रिश्तेदारों को गलत प्रमाणपत्रों के आधार पर प्राप्त नौकरियों से हाथ धोना पड़ा था। इसके अलावा
भी जिंदान ने कई रहस्योद्घाटन अपने इलाके की जन सेवाओं को लेकर किए थे।
जिंदान अपने इलाके में भ्रष्टाचार और जाति आधारित भेदभाव के विरुद्ध एक
सशक्त आवाज बन गया था। 14 सितंबर को मानवाधिकार संरक्षक और सामाजिक
कार्यकर्ताओं के एक 7 सदस्यीय दल ने मौके पर जाकर स्थानीय पंचायत, प्रशासन,
जिंदान के परिवार के सदस्यों और स्थानीय समुदाय से बातचीत करके इन तथ्यों
की जानकारी प्राप्त की। जिंदान के परिवार वालों ने बताया कि पिछले वर्ष भी
जिंदान को सतौन में मारपीट कर रेत के ढेर में दबाकर मरने के लिए छोड़ दिया
गया था, किंतु वह भाग्य से बच गया। उसने बहुत से लोगों की करतूतों का भंडाफोड़ किया था।
अतः कहीं न कहीं उन सभी की इस हत्या में
संलिप्तता के कोण से भी जांच की जानी चाहिए। जिंदान तो वैधानिक सीमाओं के
आधार पर सच्चाई को सामने लाने का प्रयास कर रहा था, यदि किसी को लगता था कि
वह गलत तरीके से उन्हें तंग कर रहा है, तो उनके लिए भी कानून के दरवाजे
खुले थे। वे पुलिस या न्यायालय की शरण में जाते, किंतु कानून को अपने हाथ
में लेकर इस तरह का जघन्य अपराध करना क्षम्य नहीं हो सकता है। जिंदान के
हत्यारों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302ए और अनुसूचित जाति व जन
जाति (अत्याचार निरोध कानून) की धारा 3.2-5 के अंतर्गत मुकद्दमा दर्ज किया
गया है, किंतु स्थानीय राजपूत सभा अनुसूचित जाति व जनजाति एक्ट के तहत
मुकद्दमा दर्ज न करने की मांग कर रही है। ऐसी मांग संदेह को और बढ़ाती है
कि इस मामले में जातीय कोण भी हो सकता है। जब पुलिस ने धारा लगाई है, तो
पुलिस को निष्पक्ष कार्य करने देना चाहिए और उसके कार्य को इस तरह से
प्रभावित करने के प्रयास शक को साबित करते हैं। इन दूर-दराज के अंदरूनी
इलाकों में जातीय भेदभाव के मामले अकसर सामने आते रहते हैं। इसलिए एक ओर तो
मुकद्दमे की निष्पक्ष जांच के बाद न्यायिक कार्रवाई को सुनिश्चित किया ही
जाना चाहिए और दूसरी तरफ सामाजिक स्तर पर इन क्षेत्रों में जातिगत भेदभाव
दूर करने के संगठित प्रयास करने की जरूरत है। इसकी पहल स्थानीय पंचायतों,
सामाजिक संगठनों और सरकार को मिलकर करनी चाहिए।