Friday, September 28, 2018

एक दिन की हड़ताल से करोड़ों की चपत

देश भर में केमिस्टों की हड़ताल का असर हिमाचल में भी दिखा। राज्य भर में हुई हड़ताल से एक दिन में केमिस्टों को करोड़ों की चपत लगी है। हड़ताल की वजह भारत सरकार की ओर से लिया गया ऑनलाइन दवा बिक्री का नया फैसला है। प्रदेश भर में हुई हड़ताल का असर राजधानी स्थित आईजीएमसी सहित कई अन्य सरकारी अस्पतालों में भी दिखा। सिविल सप्लाई की दुकानों में कई जरूरी दवाइयां मरीजों को नहीं मिलीं। इसके अलावा सरकारी अस्पतालों में कई ओपरेशन भी टालने पड़े। हालांकि एमर्जेंसी में सभी ओपरेशन किए गए।मुख्यालय नाहन में स्वच्छता पखवाड़े के तहत शुक्रवार को विधानसभा अध्यक्ष डॉ राजीव बिंदल के नेतृत्व में सफाई अभियान चलाया गया। सफाई अभियान में बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों और नगर परिषद के कर्मियों ने भाग लिया। इस दौरान शहर के माल रोड से लेकर शिमला रोड की सफाई की गई। साथ ही लोगों को सफाई पर जागरूक भी किया गया। इस मौके पर विधानसभा अध्यक्ष ने कहा की स्वच्छता बनाए रखने के लिए सभी के सहयोग की आवश्यकता है। सभी के सहयोग से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ भारत का सपना साकार हो सकता है। उन्होंने सफाईर् को मिशन बनाने का आह्वान भी कियाप्रदेश में अपराध का बढ़ता साया चिंता का कारण बनता जा रहा है। लगभग हर दिन गंभीर अपराध सामने आ रहे हैं। यह सिलसिला पिछले एक-दो दशकों से लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इसके सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक कारणों की समीक्षा होनी चाहिए। इस मुद्दे को कतई तौर पर राजनीतिक दृष्टि से देखना और शासक दलों की निजी तू तू-मैं मैं में बदलकर रख देना वांछित नहीं होगा। इससे राजनीतिक दल मुद्दे से भटक कर अपनी-अपनी सफाई या बहादुरी बयां करने में ही सारी ऊर्जा खपा देते हैं और मुद्दा वहीं का वहीं रह जाता है। बिटिया प्रकरण हो या अपनी बूढ़ी मां को कैद करके झरोखे से रोटी डालते रहने का पशुतापूर्ण व्यवहार हो, हत्या और बजुर्गों व महिलाओं से अमानवीय व्यवहार के मामले बढ़ते जा रहे हैं। अवैध शराब, भांग और अन्य ड्रग्स का रोज पकड़ा जाना समाज में गैर कानूनी गतिविधियों में समाज की संलिप्तता बढ़ते जाने की कहानी बयां करता है। नया मामला 43 वर्षीय अनुसूचित जाति से संबंधित वकील केदार सिंह जिंदान की क्रूरतापूर्ण अमानवीय हत्या का है। दिनदहाड़े ऐसे अपराध की घटना का होना चिंता का विषय है। खासकर अपराधी का खुद यह कहना कि इस आदमी ने आरटीआई एक्ट का प्रयोग करके नाक में दम कर रखा था और लगातार धमकी देता था कि आपको सड़क पर लाकर छोडूंगा। इसी टकराव के चलते 7 सितंबर की सुबह पहले जिंदान को लाठी-डंडों से पीटा गया और बाद में गाड़ी से कुचल कर बकरास गांव में उसकी हत्या कर दी गई। जिंदान जिला सिरमौर के गांव पाब, पंचायत गुंदाहा, ब्लॉक शिलाई का रहने वाला था।
मुख्य अभियुक्त जय प्रकाश, जिसने जिंदान पर गाड़ी चढ़ाई, ने अपने खाते-जीते रिश्तेदारों के लिए बीपीएल परिवार के प्रमाण पत्र बनवा दिए थे, जिनके आधार पर उन्होंने सरकारी नौकरियां प्राप्त कर ली थीं। इस वर्ष जून मास में जिंदान ने शिमला में पत्रकार वार्ता करके आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी के आधार पर इन गलत बीपीएल प्रमाण पत्रों का भंडाफोड़ किया था, जिसके चलते जय प्रकाश के रिश्तेदारों को गलत प्रमाणपत्रों के आधार पर प्राप्त नौकरियों से हाथ धोना पड़ा था। इसके अलावा भी जिंदान ने कई रहस्योद्घाटन अपने इलाके की जन सेवाओं को लेकर किए थे। जिंदान अपने इलाके में भ्रष्टाचार और जाति आधारित भेदभाव के विरुद्ध एक सशक्त आवाज बन गया था। 14 सितंबर को मानवाधिकार संरक्षक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक 7 सदस्यीय दल ने मौके पर जाकर स्थानीय पंचायत, प्रशासन, जिंदान के परिवार के सदस्यों और स्थानीय समुदाय से बातचीत करके इन तथ्यों की जानकारी प्राप्त की। जिंदान के परिवार वालों ने बताया कि पिछले वर्ष भी जिंदान को सतौन में मारपीट कर रेत के ढेर में दबाकर मरने के लिए छोड़ दिया गया था, किंतु वह भाग्य से बच गया। उसने बहुत से लोगों की करतूतों का भंडाफोड़ किया था।
अतः कहीं न कहीं उन सभी की इस हत्या में संलिप्तता के कोण से भी जांच की जानी चाहिए। जिंदान तो वैधानिक सीमाओं के आधार पर सच्चाई को सामने लाने का प्रयास कर रहा था, यदि किसी को लगता था कि वह गलत तरीके से उन्हें तंग कर रहा है, तो उनके लिए भी कानून के दरवाजे खुले थे। वे पुलिस या न्यायालय की शरण में जाते, किंतु कानून को अपने हाथ में लेकर इस तरह का जघन्य अपराध करना क्षम्य नहीं हो सकता है। जिंदान के हत्यारों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302ए और अनुसूचित जाति व जन जाति (अत्याचार निरोध कानून) की धारा 3.2-5 के अंतर्गत मुकद्दमा दर्ज किया गया है, किंतु स्थानीय राजपूत सभा अनुसूचित जाति व जनजाति एक्ट के तहत मुकद्दमा दर्ज न करने की मांग कर रही है। ऐसी मांग संदेह को और बढ़ाती है कि इस मामले में जातीय कोण भी हो सकता है। जब पुलिस ने धारा लगाई है, तो पुलिस को निष्पक्ष कार्य करने देना चाहिए और उसके कार्य को इस तरह से प्रभावित करने के प्रयास शक को साबित करते हैं। इन दूर-दराज के अंदरूनी इलाकों में जातीय भेदभाव के मामले अकसर सामने आते रहते हैं। इसलिए एक ओर तो मुकद्दमे की निष्पक्ष जांच के बाद न्यायिक कार्रवाई को सुनिश्चित किया ही जाना चाहिए और दूसरी तरफ सामाजिक स्तर पर इन क्षेत्रों में जातिगत भेदभाव दूर करने के संगठित प्रयास करने की जरूरत है। इसकी पहल स्थानीय पंचायतों, सामाजिक संगठनों और सरकार को मिलकर करनी चाहिए।

Friday, September 14, 2018

हिंदी से प्रेम करते हैं तो इस प्रेस के बारे में ज़रूर जानिए

भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक कहे जाते हैं. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उन्होंने अलग-अलग विधाओं में लेखन किया.
महज पैंतीस साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई लेकिन उनके समय को हिंदी का भारतेंदु युग कहा जाता है. भारतेंदु और पटना का खास जुड़ाव रहा है.
जीवन काल में ही उन्होंने अपनी सारी रचनाओं का कॉपीराइट पटना की खड्गविलास प्रेस को दे दिया था.
रामदीन सिंह ने पटना में 1880 में खड्गविलास प्रेस की स्थापना की थी. प्रेस शुरू करने से पहले वे बिहार में हिंदी के लिए आंदोलन चला रहे थे.
साल 2000 में बिहार राष्ट्रभाषा
डॉक्टर एक्यू सिद्दीकी खड्गविलास की ऐतिहासिक अहमियत से अनजान हैं. इस प्रेस के बारे में उन्हें बस इतना ही पता है कि यहाँ कभी अंग्रेजों के सरकारी कागजात छपते थे.
वहीं जहाँ कभी यह मशहूर प्रेस हुआ करती थी उसी के पास की नवरंग गली में दिवंगत नन्द किशोर पांडेय का मकान है.
खड्गविलास प्रेस के पुराने कर्मचारियों में एक नन्द किशोर पांडेय भी थे. वे इस प्रेस में प्रूफ रीडर थे. इनके बेटे और संगीत शिक्षक उमेश कुमार पांडेय के पास उस ज़माने की धूमिल यादें ही बची हैं.
वे बताते हैं, "उस ज़माने में साहित्य और पत्रिकाओं के प्रकाशन के लिए यह प्रेस मशहूर थी. मैं भी कुछेक बार पिता जी के साथ प्रेस पर गया था. साधारण मगर प्रेस की बड़ी सी बिल्डिंग थी. नीचे छपाई का काम होता था और ऊपर लोग रहते थे."
परिषद् की किताब "आधुनिक हिंदी के विकास में खड्गविलास प्रेस की भूमिका" प्रकाशित हुई थी. इसके लेखक डॉक्टर धीरेन्द्रनाथ सिंह हैं. इस किताब के मुताबिक यह आधुनिक हिंदी की पहली प्रेस थी. स किताब में धीरेन्द्रनाथ सिंह बताते हैं, "रामदीन सिंह के मित्र एवं कवि और नाटककार मझौली नरेश लाल खड्गबहादुर मल्ल भारतेन्दु के भी करीबी थे. उन्होंने ही रामदीन सिंह का परिचय भारतेन्दु से कराया था.रो. राम निरंजन परिमलेंदु बिहार सरकार के सर्वोच्च साहित्य सम्मान 'राजेंद्र शिखर सम्मान' से सम्मानित हिंदी साहित्य के इतिहासकार हैं.
वे खड्गविलास प्रेस को भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनाओं का कॉपीराइट मिलने के बारे में बताते हैं, "भारतेंदु हरिश्चंद्र उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हिंदी के सर्व्यमान्य नेता थे.
तब साहित्य के एक बड़े केंद्र बनारस के वो सबसे बड़े आकर्षण थे. भारतेंदु को आश्चर्यजनक ढंग से प्रसिद्धि मिल गई थी. लेकिन तब तक भारतेंदु शाहखर्च (बहुत अधिक ख़र्च करने वाला) होने और दूसरी वजहों से कर्ज में डूब गए थे. से में उस जमाने में रामदीन सिंह ने भारतेंदु को एक मुश्त चार हज़ार रूपये देकर उन्हें कर्ज से मुक्त किया. इतना ही नहीं इसके बाद भी रामदीन सिंह ने कई बार भारतेंदु की आर्थिक मदद की."
इस सम्बन्ध में धीरेन्द्रनाथ सिंह की किताब में भारतेंदु द्वारा तब के कलकत्ता के एक मित्र को पत्र लिखने का जिक्र है.
हिंदी दिवस पर मेरी प्रिय कविता
क्या होता है भारत में हिंदी मीडियम होने का दर्द?
प्रोफ़ेसर राम निरंजन परिमलेंदु बताते हैं, "1882 में मिले इस अधिकार-पत्र को उन्होंने अपने द्वारा प्रकाशित किताबों, पत्र-पत्रिकाओं में जमकर छापा. इस करार के बाद भारतेंदु जब भी पटना आते थे तो खड्ग विलास प्रेस में ही रुकते थे."
"अखिल भारतीय स्तर पर उस जमाने का शायद ही कोई ऐसा साहित्यकार रहा होगा जिसके रिश्ते इस प्रेस न रहे हों. यह प्रेस तब साहित्कारों का तीर्थ बन गई थी. 1935 तक इस प्रेस का स्वर्ण काल रहा."
भारतेंदु के निधन के बाद 1888 के करीब उनकी छह खण्डों वाली ग्रंथावली का प्रकाशन भी खड्गविलास प्रेस ने ही किया.
इसके नाटक, गद्य, काव्य खंड अलग-अलग थे. यह तब हिंदी में संभवतः किसी भी लेखक की प्रकाशित पहली ग्रंथावली थी.
इतना ही नहीं रामदीन सिंह की कोशिशों से भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रमाणिक और विस्तृत जीवनी का प्रकाशन भी हुआ. साल 1905 में शिवनंदन सहाय द्वारा सम्पादित 'सचित्र हरिश्चंद्र' का प्रकाशन खड्गविलास प्रेस ने किया था.
जिसमें वे लिखते हैं, "सम्प्रति रामदीन सिंह ने एक साथ चार हजार रुपये देकर मुझे उऋण किया है. वे 'क्षत्रिय पत्रिका' के संपादक हैं. अब मैं किसी को पुस्तकें छापने न दूंगा, प्रकाशित-अप्रकाशित समस्त पुस्तकों का स्वत्व भी इन्हीं को दिये देतारोफेसर राम निरंजन परिमलेंदु के मुताबिक सम्पूर्ण भारतीय भाषाओँ के इतिहास में कॉपीराइट का पहला मुकदमा भी इसी प्रेस की ओर से पटना में किया गया था. बनारस की भारत जीवन प्रेस ने भारतेंदु की 'अंधेर नगरी' नाटक की किताब बिना खड्गविलास प्रेस के अनुमति के छाप दी थी. ऐसे में खड्गविलास प्रेस ने भारत जीवन प्रेस पर कॉपीराइट का मुकदमा कर दिया.
मुकदमा पटना की अदालत में चला जिसमें खड्गविलास प्रेस की जीत हुई. पटना के जिला जज ने 17 दिसम्बर, 1886 को रामदीन सिंह के पक्ष में फैसला सुनाया.
परिमलेंदु बताते हैं, "इस पूरे मामले का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि सुनवाई के दौरान पटना आने पर भारत जीवन प्रेस के प्रोपराइटर रामकृष्ण वर्मा खड्गविलास प्रेस में आकर ही ठहरते थे."
"दोनों एक साथ कोर्ट जाते और वहां से अपने-अपने वकीलों के पास चले जाते. उस दौर का सामाजिक सौहार्द कुछ ऐसा था."
खड्गविलास प्रेस तब के भारत के गिने-चुने बड़े छापाखानों में से एक था. रामदीन सिंह का जन्म 1856 और उनकी मृत्यु 1903 में हुई. वे खुद भी एक लेखक थे.
परिमलेंदु का कहना है कि उन्होंने 1882 में बिहार दर्पण नाम से एक किताब लिखी थी जो हिंदी की पहली जीवनी पुस्तक है. इसमें गुरु गोविंद सिंह सहित कई हस्तियों और समाज सुधारकों की जीवनी छपी थी.
कहाँ से आए ज़िला दंडाधिकारी, सचिवालय जैसे शब्द
हिंदी साहित्य सम्मेलन या साड़ी सेल सेंटर?
आज पटना के अशोक राजपथ पर जहाँ बीएन कॉलेज है उसके सामने वाली गली में थोड़ा अन्दर जाने पर यह प्रेस था. आजादी के बाद साठ के दशक तक यह प्रेस वजूद में रहा लेकिन तब तक यहाँ साहित्य का प्रकशन बंद हो गया था, केवल छपाई के काम होते थे.
जिस मकान में यह प्रेस था वह अब बिक चुका है. डॉक्टर एक्यू सिद्दीकी ने यह मकान ख़रीदा और कुछ दिनों बाद उसी ज़मीन पर नर्सिंग होम की नई इमारत खड़ी की.
डॉक्टर सिद्दीकी ने बताया, "1988 में मैंने जब यह दोमंजिला बिल्डिंग खरीदी तब यह बहुत बुरी हालत में थी. लोग इस मकान को भुतहा बताते थे और कोई इसे लेने को तैयार नहीं था."
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' लिखित खड़ी बोली हिंदी के पहले महाकाव्य प्रिय-प्रवास का प्रकाशन भी 1915 में इसी प्रेस ने किया था.

Monday, September 10, 2018

यहां रहनेवाले हर इंसान को क्यों ऑपरेशन करवाना पड़ता है

निया में किसी भी जगह रहने के लिए कुछ शर्तें होती हैं. कुछ क़ानूनी ज़िम्मेदारियों होती हैं. जैसे भारत में रहने के लिए हर भारतीय के पास आधार नंबर होना 'ज़रूरी' (मामला न्यायालय में) है. विदेशियों के पास यहां रहने के लिए अपने मुल्क का पासपोर्ट और भारत से वीज़ा मिलना ज़रूरी है.
लेकिन अंटार्कटिका में एक बस्ती ऐसी भी है जहां लंबे वक़्त के लिए रहना है तो अपनी अपेंडिक्स को ऑपरेशन कर के हटवाना ज़रूरी शर्त है.
अंटार्कटिका बेहद सर्द महाद्वीप है. यहां लोग कुछ महीनों के लिए ही रहते हैं. मगर, इस सर्द वीराने में भी इंसानों की कुछ बस्तियां आबाद हैं. ऐसी ही एक बस्ती है विलास लास एस्ट्रेलास.
ये अंटार्कटिका का वो इलाक़ा है जहां या तो रिसर्च के मक़सद से वैज्ञानिक रहते हैं, या फिर चिली की वायु सेना और थल सेना के जवान रहते हैं.
ज़्यादातर सैनिक यहां आते-जाते रहते हैं. लेकिन बहुत से वैज्ञानिक और सैनिक यहां लंबे समय से रह रहे हैं. वो यहां अपना परिवार भी साथ ले आए हैं. विलास लास एस्ट्रेलास की आबादी बमुश्किल सौ लोगों की होगी.
हालांकि यहां किसी बड़े गांव या छोटे शहर जैसी सुविधाएं नहीं हैं. फिर भी ज़रूरत के मुताबिक़ जनरल स्टोर, बैंक, स्कूल, छोटा-सा पोस्ट ऑफ़िस और अस्पताल बना दिए गए हैं.
स्कूलों में बच्चों को बुनियादी तालीम तो मिल जाती है, लेकिन अस्पतालों में इलाज बहुत ही सतही मिलता है. अंटार्कटिका में एक बड़ा अस्पताल है, लेकिन वो विलास लास एस्ट्रेलास गांव से एक हज़ार किलोमीटर दूर है.
रास्ते भर बर्फ़ के पहाड़ों से होकर गुज़रना पड़ता है. ये बड़ा अस्पताल भी शहर के किसी मल्टी स्पेशियालिटी अस्पताल जैसा नहीं है. बेस के अस्पताल में चंद ही डॉक्टर हैं और वो भी माहिर सर्जन नहीं हैं. इसीलिए किसी भी तरह की इमरजेंसी से बचने के लिए लोगों को अपेंडिक्स का ऑपरेशन करवाना ज़रूरी होता है.
यहां के लोगों की ज़िंदगी जितनी अद्भुत है, उससे भी ज़्यादा अद्भुत है ये जगह. अलग-अलग दिशाएं बताने वाले निशानों को देखकर ही अंदाज़ा हो जाता है कि ये जगह घनी आबादी से कितनी दूर है.
मिसाल के लिए बीजिंग यहां से क़रीब 17,501 किलोमीटर दूर है. ज़रूरत का सामान यहां सेना के विशाल हवाई जहाज़ अमरीकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन के बनाए मालवाहक विमान सी-130 हर्क्यूलिस से लाया जाता है. आसपास के इलाक़ों में चलने के लिए  ट्रक और राफ़्टिंग बोट की ज़रूरत पड़ती है.
इस इलाक़े का औसत तापमान साल भर माइनस 2.3 सेल्सियस रहता है जो कि अंटार्कटिका के मुख्य इलाक़े के तापमान के मुक़ाबले काफ़ी गर्म है.
बर्फ़ की चट्टानों से लगी कुछ इमारतें भी हैं जिनके अंदर का तापमान बाहर के मुक़ाबले बेहतर होता है. बिल्डिंगों के अंदर सजावट भी बेहतर है. दीवारों पर कुछ ख़ास यादगार तस्वीरें लटकी दिख जाती हैं. इनमें एक तस्वीर मशहूर वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग्स की भी लगी है.
सर्जियो क्यूबिलोस चिली के एयरफ़ोर्स बेस के कमांडर हैं. वो यहां क़रीब दो साल से अपनी पत्नी और बच्चे के साथ रह रहे हैं. हालांकि उनका परिवार कुछ दिन के लिए चिली लौट गया था, लेकिन ख़ुद सर्जियो दो साल से यहीं पर हैं.
अपने तजुर्बे के आधार पर वो कहते हैं कि यहां सर्दी का मौसम झेलना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि सर्दी में तापमान माइनस 47 डिग्री तक पहुंच जाता है. ऐसे में कई-कई दिन घर में ही क़ैद रहना पड़ता है.
वो कहते हैं कि अब तो उनके परिवार को भी यहां का मौसम झेलने की आदत हो चुकी है. वो अब ना सिर्फ़ मौसम का मज़ा लेते हैं बल्कि अन्य सैनिकों के परिवारों के साथ हैलोवीन जैसे त्यौहार भी मनाते हैं.
परिवार के साथ रहने वालों को एक और बात का ख़्याल रखने की सलाह दी जाती है. ख़ासतौर से सैन्य बेस में रहने वालों को हिदायत दी जाती है कि उनकी पत्नी गर्भवती ना हो क्योंकि मेडिकल सुविधा के अभाव में कोई भी बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है.
यहां पेंगुइन को इंसानों से ख़तरा नहीं है. वो बेख़ौफ़ घूमती हैं. लेकिन तापमान ज़्यादा गिरने पर मरती भी ख़ूब हैं. तापमान गिरने पर समुद्र में भी बर्फ़ जम जाती है.
सैन्य बेस से काफ़ी दूरी पर ऊंचाई वाले इलाक़े पर ट्रिनिटी नाम का एक रूसी चर्च है. बताया जाता है कि इसे रूस के एक रूढ़िवादी पादरी ने बनाया था.
विलास लास एस्ट्रेलास दुनिया का ऐसा हिस्सा है जहां किसी और ग्रह पर रहने का अनुभव किया जा सकता है. इसमें कोई शक नहीं कि यहां रहना एक चुनौती भरा काम है. लेकिन यहां रहने वालों को जिस तरह की ज़िंदगी का तजुर्बा होगा वो दुनिया के किसी और इंसान को नहीं हो सकता.
उत्तर कोरिया ने अपने 70वें स्थापना दिवस समारोह के दौरान आयोजित सैन्य परेड के दौरान इंटर कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (आईसीबीएम) का प्रदर्शन नहीं किया है.
हालांकि अभी यह अस्पष्ट है कि उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन ने इस कार्यक्रम के दौरान कोई भाषण दिया था या नहीं.
उत्तर कोरिया के सैन्य हथियारों और परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर उसकी प्रतिबद्धता को जानने के लिए परेड पर पूरी दुनिया की निगाहें लगी हुई थी.
कुछ विश्लेषकों ने उम्मीद जताई थी कि किम जोंग उन अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के साथ शिखर वार्ता के बाद अपने हथियारों का प्रदर्शन करना कम कर देंगे.
यदि इस परेड में उस आईसीबीएम का प्रदर्शन किया जाता जिसमें अमरीकी धरती तक मार करने की क्षमता है तो उसे उकसाने वाला कदम माना जाता.
न्यूज एजेंसी एएफपी ने इस परेड की कोई तस्वीर जारी नहीं की है. हालांकि उनका एक फ़ोटो जर्नलिस्ट इस परेड को कवर कर रहा था.
एनके न्यूज़ जिसके पास सरकारी टीवी से मिली तस्वीरें थीं, उन्होंने परेड में आईसीबीएम के नहीं शामिल किए जाने की पुष्टि की है.
जून में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की मौजूदगी में उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग उन ने कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु मुक्त बनाने को लेकर एक अज्ञात समझौते पर दस्तखत किए थे, लेकिन इसे पूरा करने के लिए कोई समयसीमा, इसकी रूपरेखा और प्रक्रिया तय नहीं की गई थी.
तब से दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय बातचीत चलती रही, लेकिन हाल ही में अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो की निर्धारित यात्रा आखिरी समय में रद्द कर दी गई और दोनों देशों ने एक दूसरे पर समझौता वार्ता में रुकावट डालने का आरोप लगाया.
हालांकि दोनों ने यह भी कहा कि वो विकास के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
सियोल स्थित बीबीसी संवाददाता लौरा बिकर ने कहा कि यदि उत्तर कोरिया इस परेड में आईसीबीएम को प्रदर्शित करता तो इससे भविष्य में समझौता वार्ता की संभावना ख़त्म हो जाती.त्तर कोरिया में उनका सबसे बड़ा खेल आयोजन भी होना है जो पिछली बार 2013 में हुआ था.
बड़े स्तर पर होने वाला यह खेल आयोजन इस देश की अच्छी छवि के प्रचार के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है.
इस साल के आयोजन का नाम द ग्लोरियस कंट्री रखा गया है जिसमें उत्तर कोरिया के इतिहास से जुड़ी प्रतीकात्मक कहानियां बताई जाएंगी.
पिछले दो हफ़्तों से उपग्रहों से मिल रही तस्वीरों के मुताबिक इस वर्ष यह खेल बहुत बड़े स्तर पर आयोजित किया जा रहा है जो सितंबर के पूरे महीने में चलता रहेगा.
इससे पहले आयोजित खेल बहुत बड़े स्टेडियमों में लयबद्ध जिम्नास्टिक और तालमेल के साथ डांस के प्रदर्शन के साथ किए थे.
इन रंगारंग कार्यक्रमों के बहुत भव्य होने की उम्मीद है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने पहले कहा था कि इन खेलों में और इसकी तैयारी में बच्चों को भाग लेने के लिए बाध्य किया जाता है.
बताया जा रहा था कि इस परेड के लिए पिछले छह महीने से तैयारियां चल रही थीं. उत्तर कोरिया की सरकारी मीडिया ने इस परेड को "जीत का जश्न और देश की अर्थव्यवस्था के तेज़ी से होते विकास को दर्शाने वाला" क़रार दिया है.
कई विश्लेषकों का मानना है कि किम जोंग-उन ऐसी उपलब्धि चाहते हैं जो उनके पिता और दादा भी हासिल नहीं कर पाए- वो कोरिया के युद्ध की समाप्ति की घोषणा करना चाहते हैं.
ये युद्ध एक सैन्य समझौते के बाद 1953 में ख़त्म हो गया था. लेकिन कभी कोई शांति समझौता नहीं हुआ.
अमरीका के साथ बातचीत अटकने के बाद किम जोंग-उन ने इस हफ़्ते दक्षिण कोरिया के प्रतिनिधिमंडल का अपने देश में स्वागत किया और कोरियाई प्रायद्वीप को "परमाणु-मुक्त कराने की अपनी प्रतिबद्धता" को दोहराया.
दक्षिण कोरिया के अधिकारियों के मुताबिक किम इस बात से परेशान हैं कि उनकी सकारात्मक कोशिशों पर दुनिया भरोसा नहीं कर रही है.
वो अमरीका के साथ रिश्ते बेहतर करने की इच्छा जता चुके हैं. वो जानते हैं कि ऐसा करने के लिए परमाणु निरस्त्रीकरण पहली शर्त है.
किम ट्रंप के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं. ट्रंप भी ट्वीट कर जवाब दे चुके हैं कि "वो साथ मिलकर ये करने को तैयार हैं."
हालांकि इन कोशिशों की राह में अब भी एक बड़ा रोड़ा है. किम जोंग-उन उत्तर कोरिया के अबतक के सबसे खुले विचारों के नेता तो दिखना चाहते हैं, लेकिन वो दुनिया को अब भी उत्तर कोरिया का एक सीमित रूप ही दिखाना चाहते हैं. और विदेशी मीडिया को परेड के लिए आमंत्रित करना एक ऐसा ही क़दम है.

Tuesday, September 4, 2018

निजाम म्यूजियम से सोने का 2kg का टिफिन बॉक्स सहित करोड़ों का सामान चोरी


सचिन तेंदुलकर ने स्वयं भी काफी कम उम्र में ही सफलता हासिल कर ली थी और उन्हें पृथ्वी शॉ की विलक्षण प्रतिभा को पहचाने में भी अधिक समय नहीं लगा. तेंदुलकर ने पृथ्वी की प्रतिभा को आठ साल की उम्र में ही पहचान लिया था और उन्होंने उसे कहा था कि कोई कोच उसकी नैसर्गिक तकनीक को नहीं बदले.
आखिरी 2 टेस्ट के लिए टीम इंडिया में हनुमा-पृथ्वी को मौका, मुरली विजय बाहर
तेंदुलकर अपने अपनी ऐप ‘100 एमबी’ पर कहा, ‘मैंने उसे कहा था कि भविष्य में उसके कोच उसे जितने की निर्देश दें वह अपनी ग्रिप या स्टांस नहीं बदले. अगर कोई तुम्हें ऐसा करने के लिए कहे तो उसे कहना कि वह मझसे से बात करे. कोचिंग देना अच्छा होता है, लेकिन किसी खिलाड़ी में अत्यधिक बदलाव करना नहीं.’
इस पूर्व महान बल्लेबाज ने कहा, ‘यह बेहद महत्वपूर्ण है कि जब आप ऐसे विशेष खिलाड़ी को देखें, तो कुछ बदलाव नहीं करें. यह भगवान का तोहफा है.’
तेंदुलकर ने कहा, ‘लगभग 10 साल पहले मेरे एक मित्र ने मुझे युवा पृथ्वी को खेलते हुए देखने को कहा. उसने मुझे कहा कि मैं उसके खेल का आकलन करूं और उसे कुछ सलाह दूं. मैंने उसके साथ सत्र में हिस्सा लिया और खेल में सुधार के लिए कुछ चीजें बताईं.’
पृथ्वी शॉ को पहली बार खेलते हुए देखने के बाद तेंदुलकर ने अपने मित्र से कहा था, ‘तुम देख रहे हो? यह भविष्य का भारतीय खिलाड़ी है.’ इस साल 18 साल के पृथ्वी की अगुआई में भारत ने अंडर 19 विश्व कप जीता. उन्होंने 14 प्रथम श्रेणी मैचों में सात शतक की मदद से 56.72 की औसत के साथ 1418 रन बनाए हैं.
उत्तर प्रदेश में तराई का एक जिला है. नाम है बलरामपुर. यहां के अचानकपुर इलाके के नंदपुर गांव के लोगों ने एक बुजुर्ग की मॉब लिंचिंग की कोशिश की है. और ये मॉब लिंचिंग की कोशिश इस बार किसी मुस्लिम के साथ नहीं बल्कि हिंदू के साथ हुई है. और इस बार भी मॉब लिंचिंग की वजह एक गाय बनी है.
देहात कोतवाली इलाके के लक्ष्मणपुर गांव के रहने वाले कैलाश नाथ शुक्ल 30 अगस्त की शाम को करीब पांच बजे अचानकपुर नंदपुर गांव से गाय लेकर जा रहे थे. उनकी गाय बीमार थी, जिसके इलाज के लिए वो उसे जुआथान श्रीनगर लेकर जा रहे थे. अचानक से गाय ने उनके हाथ से जंजीर छुड़ा ली और भागने लगी. कैलाश नाथ ने गाय का पीछा किया और उसे पकड़ लिया. पूरी घटना गांव के लोग देख रहे थे. अचानक से गांव के ही कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया और पिटाई करने लगे. बदमाशों का मन इतने से भी नहीं भरा तो 70 साल के बुजुर्ग कैलाश को उन्होंने गाय की ही जंजीरों से बांध दिया, सिर मुंडवा दिया और कालिख पोतकर पूरे गांव में घुमाया. इसके बाद बदमाशों ने बुजुर्ग को एक गड्ढे में धकेल दिया. वहां से किसी तरह बदमाशों के चंगुल से निकलकर कैलाश शुक्ल देहात कोतवाली पहुंचे और बदमाशों के खिलाफ तहरीर दी. एसपी राजेश कुमार के मुताबिक पिटाई के आरोपियों दिनेश शुक्ल, उमेश तिवारी, जीवनलाल और ननकने को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है. वहीं कैलाश नाथ शुक्ल को जिला मेमोरियल अस्पताल में भर्ती करवाया गया है.