Thursday, August 30, 2018

我为什么抗议马云狩猎?

中国富豪、阿里巴巴董事局主席马云英国狩猎,遭遇中国环保人士抗议。

有英国媒体道,两年前,马云花费3.6万英镑,于苏格兰一个小村落租了一座城堡,与11位朋友共同打猎,一周内猎取17只雄鹿。

中国环保组织“自然大学”随后发公开信,表示抗议,称其行为将激发中国富豪狩猎热,对野生动物保护工作产生负面影响。

抗议马云狩猎
,有可能意味着“自然大学”以后将得不到阿里巴巴公益基金会的资助。但“自然大学”创办人冯永锋并不后悔。他说,环保组织是要有态度的,对某个问题有看法和判断,就要及时说出来。一个行业的健康,也需要这样的深度互动。这才是真正的团结。

中外对话采访了冯永锋。

中外对话:有网民认为,“自然大学”抗议马云狩猎是在“捏软柿子”, 与其向马云抗议,不如要求欧、美、非洲等地区跟中国一样禁止狩猎。您怎么看待“捏软柿子”?

冯永锋:在中国,环保组织经常要打“遭遇战”,每天会发生什么事,你根本没法预料到。遭遇了,就要表态,就要表达,就要干预。“自然大学”是一家以行动干预加行动研究见长的组织,我们每天都在针对事件做积极的回应。我们一年介入类似的事件成百起。马云只是一个小案例而已,他不是“软柿子”也不是“硬柿子”。从环保角度来说,这也算不上什么特色案例,只是我们诸多遭遇战中的一个小战役。没什么大惊小怪的。

我们当然也在调研中国的狩猎问题,虽然做得并不持续。我们这两年干预的大量野生动物尤其是鸟类的保护案例,已经足以证明,中国的野生动物每天都在遭遇各种残酷的捕杀。没有一个物种不是在中国人的威逼下苟延残喘。一些具体的调查结果我们也会陆续公布。

中外对话:允许中国富人去英国等发达国家狩猎,是不是一件好事,毕竟还有很多运动狩猎爱好者,中国富人也是人,也有享受合法爱好和运动狩猎的权利。他们去管理规范的国家狩猎,能否减轻中国野生动物保护的压力?

冯永锋不可能,打哪国的动物都是杀害动物。而且要命的是,这些人不会因为到了国外打猎,就学会了尊重自然和保护环境,相反,他们只是过了一把开枪的杀戮瘾而已。

中外对话:说中国不适合狩猎,“自然大学”有过详细调查吗?

冯永锋中国物种的灭绝速度,估计是全世界最快的。原因很简单,一是自然栖息地的大量散失和破碎化,二是各种形式的捕杀和食用,三是无止境的人工养殖许可导致野外种群被大量捕捉,四是各种动物园、标本爱好者、宠物爱好者的大量购买和消费。

我们当然不可能对国内的所有情况进行调查。但我们每天都在干预各种遭遇到的野生动物伤害事件,也和全国的关注动物保护的组织有密切来往。中国这片土地上,对野生动物每天都发生着什么事,我们应当是极清楚的。

中外对话:马云对中国环保事业是有贡献的,因其两年前在英国的一次并不违法的狩猎经历,而严加指责,这对马云是不是不公平?从团结环保人士的角度来看利弊如何?

冯永锋马云的阿里巴巴基金会正在尝试资助中国的民间环保组织,他们的探索我们是看在眼里的。但马云过度相信了“世界先进”,耗巨资去和大自然保护协会( )来往,我觉得这个做很愚蠢。因为中国的环境保护,希望一定在中国的“草根”组织身上。你不全力支持“草根”,却花这么高的学费去学些可能根本用不上的“先进技能”,我认为得不偿失。

环保组织是要有态度的,你对某个问题有看法和判断,就要及时地说出来。一个行业的健康,也需要这样的深度互动。这才是真正的团结。如果说担心他们以后不资助 “自然大学”,就不敢说话了,这不是我们的风格。虽然,明快表达是一定会有代价的。确实有可能,阿里巴巴公益基金会,会因为我们的批评表态,而不愿意再资助我们。

中外对话:有观点认为,把运动狩猎绝对化加以否定,仅从这点来看,就暴露出中国环保组织的一个软肋:做事缺乏理性和科学精神,更多的是凭热情和理想在干。在中国做环保,最需要的是什么?

冯永锋:理性和科学往往是最大的假象,那些说别人不理性不科学的人,自己也理性不到哪去,科学不到哪去。他们用来推理和试图压服他人的证据,要么是古代的片面说道根本站不住脚,要么是别国的探索完全与本国不沾边,要么是“大胆的假设”根本无法在现实中推行,要么是必须满足诸多不可能的条件下的狭窄可能。

我觉得,中国的问题在中国,解决中国问题的出路和智慧也都在中国。永远面对现实的环境问题,老实地去干预和改良,这是中国民间环境保护的唯一出路。这几年,我们还是很可悲地发现,这样工作的民间组织太少。现实问题都不去参与解决,理性和科学有何意义?何况,做公益、做环保,本来也不可能只靠理性和科学,在我看来,理性和科学在环境保护中的作用,最多只占10%,其他的90%,都是靠勇敢、智慧、笨重的行动和韧性。

Tuesday, August 28, 2018

धनवान सऊदी अरब बलवान क्यों नहीं बन पा रहा?

मन मध्य-पूर्व का एक छोटा-सा ग़रीब देश है. इसके ख़िलाफ़ अरब के अमीर देश सालों से यु्द्ध कर रहे हैं. यमन के ख़िलाफ़ सऊदी अरब इस युद्ध का नेतृत्व कर रहा है.
सऊदी के पास यमन में उसके दुश्मनों की तुलना में ज़्यादा बेहतर हथियार हैं, लेकिन हैरान करने वाली बात है कि वो इस युद्ध को जीतने के बजाय लगातार उलझता जा रहा है.
सऊदी का दक्षिणी प्रांत नजरान यमन की सीमा से लगा है. कर्नल मसूद अली अल-शवाफ़ यहां से यमन के ख़िलाफ़ ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे हैं.
उन्होंने ब्लूमबर्ग से कहा है कि इस युद्ध के शुरू होने के बाद से ख़तरे बदल गए हैं. उन्होंने कहा कि सऊदी को जो नुक़सान उठाने पड़ रहे हैं इससे भी ये साबित होता है कि यह कोई एकतरफ़ा युद्ध नहीं है.
आख़िर ऐसा क्यों है? सऊदी के पास पैसे की कमी नहीं है, अत्याधुनिक हथियार हैं फिर भी उसकी सेना यमन से युद्ध क्यों नहीं जीत पा रही है?
सऊदी अरब के लिए बड़ी चुनौती है कि वो तेल के बेशुमार पैसे को आर्मी की ताक़त के रूप में तब्दील करे.
सऊदी के बारे में कहा जाता है कि वो पैसे से सब कुछ नहीं ख़रीद सकता. इसलिए यह बात भी कही जाती है कि वो धनवान तो है पर बलवान नहीं.
मध्य-पू्र्व मामलों के विशेषज्ञ क़मर आगा कहते हैं कि सऊदी की सेना बहुत कमज़ोर है. उसे कोई ट्रेनिंग नहीं है कि अत्याधुनिक हथियारों को चला सके.
वो कहते हैं कि ''इसकी एक मुख्य वजह ये भी है कि सऊदी का शाही परिवार इस बात से डरा रहता है कि आर्मी मज़बूत हुई तो तख्तापलट भी हो सकता है. इसलिए सऊदी अपनी सुरक्षा और सेना की ज़रूरतों के लिए अमरीका और पाकिस्तान पर निर्भर रहता है.''
यमन के ख़िलाफ़ लड़ाई में सऊदी कितना खर्च कर चुका है इसकी जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है. लेकिन पिछले दो सालों में सऊदी के कुल विदेशी धन में 200 अरब डॉलर की गिरावट से साफ़ है कि उसे जमकर आर्थिक नुक़सान हो रहे हैं.
सऊदी अरब ने यमन में मार्च 2015 में हस्तक्षेप शुरू किया था. सऊदी के नेतृत्व वाले सैनिकों ने हवाई हमले शुरू किए थे और छोटी संख्या में ज़मीन पर भी अपने सैनिकों को भेजा था.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इसी साल मार्च महीने में कहा था कि सऊदी अरब अमरीकी हथियारों का बड़ा ख़रीदार है. पिछले साल अमरीका ने सऊदी को हथियारों की ख़रीद पर 3.5 अरब डॉलर की छूट दी थी.
यह छूट 15 अरब डॉलर के एंटी-मिसाइल सिस्टम पर थी. अगर सऊदी के पास अमरीका के इतने अच्छे हथियार हैं तो उसकी सेना कमज़ोर क्यों है? सऊदी का शुमार दुनिया के उन देशों में है जो रक्षा पर मोटी रक़म खर्च करता है.
वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट में इराक़, ईरान और फ़ारस की खाड़ी के सैन्य और रक्षा विशेषज्ञ माइकल नाइट्स का कहना है, ''यह सच है कि ईरान सऊदी से सैन्य ताक़त के मामले में आगे है.''
वो कहते हैं, ''ईरान की सेना में आपको कोई ऐसा नहीं मिलेगा जो ज़मीन पर कहता हो कि उसे सऊदी की सेना से डर लगता है. इसे यमन में सऊदी के सैन्य हमले से भी समझा जा सकता है. कई सालों से युद्ध जारी है, लेकिन सऊदी को कुछ हासिल नहीं हुआ.''
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी की सेना बहुत बड़ी है इसलिए यहां गुणवत्ता पर ज़ोर कम है. दूसरी समस्या यह है कि सऊदी की सेना आज भी पारंपरिक युद्ध के हिसाब से ही तैयार है और उसे 21वीं सदी के प्रॉक्सी वॉर का सामना करना हो तो फँस जाएगी.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार सऊदी 2015 और 2016 में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश था. 2002 के बाद सऊदी के हथियार आयात में 200 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
ऐसा भी नहीं है कि सऊदी कम गुणवत्ता वाले हथियारों को ख़रीदता है. सऊदी का ज़्यादातर हथियार सौदा अमरीका से है. यहां तक कि 2016 में अमरीका ने अपने कुल हथियारों की बिक्री का 13 फ़ीसदी सौदा सऊदी अरब से किया.
सऊदी के रॉयल एयरफ़ोर्स के पास यूरोफ़ाइटर टाइफ़ून भी हैं. इसके साथ ही अमरीकी एफ़-15 इगल्स भी हैं. ये सभी अत्याधुनिक लड़ाकू विमान हैं. सऊदी का शुमार उन देशों में है जिनके पास बेहतरीन हथियार हैं.
इतना कुछ होने के बावजूद यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों पर सऊदी भारी नहीं पड़ पा रहा है. हूती सऊदी के ख़िलाफ़ बड़े हमले करने में कामयाब रहे हैं. यहां तक कि हूती विद्रोहियों ने सऊदी के भीतर भी हमले किए हैं.
सबसे शर्मनाक तो यह है कि न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार हूती की एक बैलिस्टिक मिसाइल सऊदी की राजधानी रियाद के एयरपोर्ट पर गिरी थी. शुरू में सऊदी ने इससे इनकार किया था.
माइकल नाइट्स ने बिज़नेस इनसाइडर से कहा है, ''सऊदी ने यमन में केवल हवाई हमले का सहारा लिया है. अगर उसके पास सैन्य ताक़त है तो क्यों नहीं यमन की ज़मीन पर अपने सैनिकों को उतार रहा है.'' नाइट का कहना है कि ज़मीन पर लड़ने के लिए अनुभव और ट्रेनिंग की ज़रूरत होती है जो कि सऊदी की सेना के पास है नहीं.''
वो कहते हैं, ''सऊदी की सेना के पास असाधारण ऑपरेशन का बिल्कुल अनुभव नहीं है. इसे इराक़ के उदाहरण से भी समझ सकते हैं. इराक़ में सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ जब अमरीका ने हमला किया तो उसने कोशिश की थी कि सऊदी की सेना भी साथ दे, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया था. सऊदी ने इस युद्ध में कोई योगदान नहीं दिया था.''
सऊदी अरब की थल सेना के बारे में कहा जाता है कि वो प्रशिक्षित नहीं है और ऐसे में यमन की ज़मीन पर जाकर लड़ना उसके लिए आसान नहीं है.
मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट में डिफेंस एंड सिक्यॉरिटी प्रोग्राम के निदेशक बिलाल साब कहते हैं, ''सऊदी इस बात को समझता है कि यमन में हूती विद्रोहियों से ज़मीन पर जाकर लड़ना आसान नहीं है. अगर सऊदी ऐसा करता है तो उसे ना भारपाई होने वाला नुक़सान उठाना होगा.'' ई सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि सऊदी को अपनी सेना का आकार छोटा करना चाहिए. इन सैन्य विशेषज्ञों में नाइट्स भी शामिल हैं. नाइट्स का कहना है कि सऊदी को सेना में गुणवत्तापूर्ण बहाली और प्रशिक्षण पर ध्यान देने की ज़रूरत है.
उसे ऐसी यूनिट्स बनानी चाहिए जो पड़ोसी देशों के साथ युद्धाभ्यास करे. यमन में सऊदी की स्थिति को देख कहा जा रहा है कि मध्य-पूर्व में ईरान का प्रभाव बढ़ रहा है.
सऊदी लंबे समय से हथियार बेचने वालों का पसंदीदा देश रहा है. इस मामले में वो अमरीका का दुलारा है. राष्ट्रपति ट्रंप ने 110 अरब डॉलर के सैन्य समझौते की घोषणा की थी. 32 साल के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान चाहते हैं कि वो अपने ही देश में हथियार बनवाएं. वो चाहते हैं कि 2030 तक सऊदी अपने ही घर में ज़रूरत के कम से कम आधा हथियार बनाए.
अगर ऐसा होता है तो आने वाले समय में पता चल पाएगा कि सऊदी अरब सैन्य दृष्टिकोण से कितना मज़बूत और प्रभावी हो पाता है और यमन में कोई निर्णायक भूमिका निभा पाता है.